Saturday, July 26, 2014

सहीफ़ो से छिटकी एक आयत

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गोश्त बस गोश्त होता है और जानवर बस जानवर ।
गोश्त चाहे सूअर का हो या गाय का, होता वह जानवर का गोश्त ही है।
पर जिबह की छूरी के चलनें की वजह अगर मजहबी नफरत हो तो गोश्त अपनी शक्ल भी बदल लेते है ।
लिहाजा नफरत की छूरी से जिबह गाय का गोश्त, सूअर का गोश्त बन जाता है और सूअर का गोश्त, गाय का गोश्त बन जाता है ।
(यह वह आयत है जो इंसान के गलीज मन को परख उतरी ही नहीं और सहीफों मे जा छुप बैठ गई ।)
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कश्यप किशोर मिश्र
(आदमीयत की आखिरी किताब से)

Sunday, June 29, 2014

लेनिन का ओवरकोट

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...जार और उसके परिवार को मार डाला गया, औरतों-बच्चों समेंत । रूस की मेहनतकश सर्वहारा लड़ाको का कब्जा वोल्गा के इसपार हो चुका था ।
रूस का सभ्रांत वर्ग आदतन ओवरकोट पहनता था, सामनें खूँटी पर जार का ओवरकोट टँगा था, जिसे वह कभी-कभी पहन लिया करता था, लेनिन ने उस ओवरकोच को पहन लिया और सर्वहारा का झंडा फहरानें लगा ।
लेनिन का यह ओवरकोट, बाद में स्टालिन के हाथ लग गया और उसनें उसे ओढ़ लिया ।
...उस ओवरकोट के भीतर वह पूरी तरह नंगा हुआ करता था, ट्राटस्की की नजर उस ओवरकोट पर थी ।
 नंगा क्या नहीं करता ? ट्राटस्की की नियति ही मौत थी, उसनें ओवरकोट पर नजर डाली थी । ओवरकोट, जो लेनिन का था, जिसे जार के वंश के लोग पहनते थे ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Friday, June 27, 2014

लाचार

...आखिरकार उसका शरीर पस्त हो गया । थक कर निढ़ाल हो चले शरीर से खड़े रहना भी कठिन हो रहा था |

अभी खूब सारे लोग बचे हुए थे, और वह अकेला जल्लाद !

बेचारा ! थक कर बैठ गया !

... लाचार !

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कश्यप किशोर मिश्र

Thursday, June 26, 2014

निषेध

युवक नया-नया शहर में आया था, यूँ ही टहलते टहलते वह एक संस्थान के भीतर टहलने लगा, सुबह का वक्त था, संस्थान के भीतर खूब सारे लोग टहल रहे थे, टहलते टहलते आदतन उसने एक सिगरेट सुलगा ली, सामने से एक बुजुर्ग सज्जन आते दिखे, उन्हें देख कर लोग अदब से राह से हट जा रहे थे, जिससे युवक ने अनुमान लगाया वह संभवतः संस्थान में किसी प्रतिष्ठापूर्ण पद पर होंगे|
बुजुर्ग सज्जन जब करीब आ गए तो शालीनता वश युवक ने सिगरेट पीछे कर लिया| बुजुर्ग युवक के करीब आए और सहज मुस्कराहट से उन्होंने पूछा आप शायद यहाँ नए है? युवक ने शालीनता से जबाब दिया जी, पहली बार आया हूँ ! तो बुजुर्ग ने कहाँ हाँ ! तभी आपको नहीं पता, यहाँ धुम्रपान निषेध है और एक बार पुनः युवक पर सहज वात्सल्यपूर्ण मुस्कराहट डालकर आगे बढ़ गए |
युवक मुदित-चकित भाव से बुजुर्ग को देखता रहा, निषेध है बस बता कर बुजुर्ग आगे बढ़ गए, यह बता देना कितना सहज था, अबतक उसने यही देखा था कि मनाही के साथ-साथ मना करने वाला अपना रौब भी दिखाता था, कभी-कभी यह भी होता था कि मनाही करने वाला मोहलत भी देने लगता खैर, पहली बार है,पी लीजिये पर आइन्दा याद रखियेगा कि यहाँ मनाही है कुल मिला कर मनाही करने वाला उस मनाही के बहाने ख़ुद के होने की स्थापना करता था, जबकि यह बुजुर्ग जो है, बस वह बाता कर आगे बढ़ गए |
अगली सुबह युवक टहलने निकला तो उसके पाँव पुनः उसी तरफ बढ़ चले, टहलते-टहलते अनायास ही अवचेतन में ही पल रही आदत के वश उसने सिगरेट सुलगा ली और इसका ध्यान तब आया जब बुजुर्ग सामने ही दिख गए, युवक की दशा मानो काटो तो खून नहीं वाली थी, बुजुर्ग ने युवक को देखा, एक परिचित मुस्कराहट डाली और कहा आपको दुबारा देख कर अच्छा लगा, यहाँ धुम्रपान निषेध है और आगे बढ़ गए |
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कश्यप किशोर मिश्र      

Wednesday, June 25, 2014

पालिटिक्स

हत्या बस हत्या होती है ।
हत्यारा सिर्फ और सिर्फ हत्यारा होता है ।
हथियार कुछ भी हो सकता है, धार्मिकता, नास्तिकता, शून्यवाद, अस्तित्ववाद, जनसेवा, क्रांति, मानवाधिकार, सेना, कुछ भी ।
यह तो हत्यारे पर है, वह हथियार क्या बनाता है, एक हत्यारा जिस नली से किसी मरणासन्न को जीवनदायिनी आक्सीजन दी जा रही है, उसका इस्तेमाल उस रोगी की हत्या में कर लेता है । वह नली हत्यारा नहीं होती ।
...तो हमें ये पैतरें पता है ।
हथियार को हत्यारा बताने के पीछे तुम्हारी मंशा क्या है, दोस्त ?
एक सवाल पूछे? 
"तुम्हारी पालिटिक्स क्या है, दोस्त?"
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, June 21, 2014

बच्चे का रोना

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...सारी नफरत निकल चुकी थी, हिंसा के विभत्स ताडंव से बस्ती सारी रात के दौरान कई बार गुजरी और हिंसक हमलावरों ने बर्बर होकर, चुन चुन कर एक एक आदमी का, जो भी मिले उनका कत्ल कर डाला ।

सुबह की उजास के साथ हमलावर अपने रक्तरंजित हथियार पोछते लौटनें लगे, कि तभी एक झोपड़ी से एक बच्चे के रोनें की आवाज आई, बच्चा जग कर दूध के लिए अपनीं माँ को ढ़ूढ़ रहा था, लौटते हुए हमलावरों के कदम रूक गए । वो पलट कर वापस देखनें लगे । झोपड़ी के दरवाजे से रोते हुए, दूध और अपनी माँ को तलाशता एक दो साल का बच्चा बाहर आया, हमलावरों के नेता और रोते बच्चे की निगाहें आपस में मिली । हमलावरों के नेता के पैर लरज गए ।

...इस बात को आज साठ बरस गुजर चुके हैं, अपनें उम्र के चौथेपन में चल रहे, हमलावरों के नेता के पैर अपनें नाती पोतों के रोनें की आवाज से लरज जातें है, वह धम्म से जमीन पर गिर पड़ता है ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Thursday, June 19, 2014

शहर में अब भेड़िये नहीं आते

...और फिर भेड़िये ने मेमने से कहा “मै तुम्हे खा जाऊंगा !”
मेमने ने स्मित मुस्कराहट के साथ भेड़िये को देखा और उसकी मुस्कराहट वक्र होते-होते क्रूर हो गई | थोड़ी देर पहले विस्फरित दीख रहे मेमने के नेत्रों में समुन्द्र सा ठहराव नजर आया और थर-थर कांपता मेमना शांत स्थिर और एकदम सहज होकर भेड़िये के सामने खड़ा उसे घूरते हुए बोला “घामड़ पशु ! तू क्या किसी अखबार का संपादक है ? या किसी समाचार चैनल का प्रमुख? अगर है भी तो अपनी कीमत बता, मुझे तुझ जैसे भेड़िये की खाल वालों की बड़ी ज़रूरत है”
भेड़िया एक कदम पीछे हट गया...
मेमना सहज गुरु-गंभीर आवाज में बोला “अगर तू कोई राजनितिक है, धनपशु है, तो बता, मै देखूं तेरा क्या इस्तेमाल हो सकता है? नौकरशाह, कारोबारी, दलाल क्या है तू ?” “डर मत तेरी पहचान बस मुझतक रहेगी, बाता क्या है, तू”
भेड़िया अब सचमुच डर गया, उसने अपने धड़कते कलेजे को काबू में किया और अपनी गुर्राहट को और धारदार निकालने की कोशिश करते हुए, यह जताने की कोशिश की, कि वाकई वो खूंखार भेड़िया ही है, और कहा “मुर्ख मेमने, मै तुझे बताकर तेरी मौत देना चाहता था, पर तू एक दम जाहिल निकला, रे मूर्ख मेमने, भेड़िया का मतलब मेमने की मौत होता है, मौत-जो तेरे सामने खड़ी है”
मेमना ठठा कर हँसा और उसने कहा “घामड़ जानवर, तू तो निरा जंगली जानवर निकला, ये तेरे जंगल का काईदा है, कि जो शेर है, वह शेर है जो लोमड़ी है, वह लोमड़ी ! यह आदमियों की बस्ती है, बच्चे ! इसे शहर कहते है | यहाँ जो शेर दिखता है, वो गीदड़ होता है और जो मेरे जैसा मेमना दिखे, वो तेरे जैसे भोले मूर्खों को फांसने का फंदा होता है”
ऐसा कह मेमने ने अपनी खाल उतार फेंकी, सामने बबर-शेर था! भेड़िये की हवा सरक गई, वह एकदम अपनी गुद्दी से तीन सौ साथ डिग्री घूमा और भाग चला | इधर मेमना अब शेर की खाल उतार रहा था |
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कश्यप किशोर मिश्र

Tuesday, June 17, 2014

जानकारी से भी अज्ञान उपजता है

जो तुम देख रहे हो, वह वही है, इस बात का क्या भरोसा ? हो सकता है वह कुछ और हो और तुम्हे बताया कुछ और गया हो, इसे प्रमाणित कौन करेगा कि जो तुम्हे बताया गया है, जो तुम जानते हो वह पूर्ण सत्य है | तुम्हे सांप खतरनाक दिखता है, उसमे विषदंत होते है| यह तुम्हारी जानकारी है, कि सांप एक बहुत ही खतरनाक प्राणी है और यह डंस ले तो आदमी मर जाता है, लिहाजा तुम सांप देखते हो और उसे मार देते हो |

तुम्हारी स्थापनाए कितनी झूठी है, यह कौन तय करेगा ? क्योकि तुमने जिन जानकारियों से अपने पूर्वाग्रह तय कर लिए है, वे जानकारिया भी झूठी हो सकती है | जिस विष की वजह से तुम सांप को खतरनाक मानते हो, वह विष, अस्सी प्रतिशत से भी जादा साँपों में होता ही नहीं और साँप के काटने से मरने वाले लोगो का एक बड़ा हिस्सा सांप के ज़हर से न मर कर भय से मरता है |

जादा खतरनाक कौन है, विष या भय ? चलो मान लेते है दुनिया में कुछ सांप विषैले हैं और उसकी वजह से वे सांप खतरनाक है, उन विषैले साँपों की वजह से कुछ व्यक्तियों की मौत भी होती है, पर उस भय का क्या ? जिस भय की वजह से आदमी सदमे में आकर मर जाता है, यह भय तो आदमी के भीतर है | यह भय सांप के विष से भी जादा खतरनाक है, जो तुम्हारे भीतर है | तो तुम्हारे लिए जादा ख़तरनाक क्या हुआ, सांप का विष या तुम्हारे भीतर समाया भय|

अगर सांप अपने विष की वजह से खतरनाक है, तो उससे जादा खतरनाक भय जो तुमने अपने भीतर पाल-पोस रखा है, उसकी वजह से तुम भी तो खतरनाक हो, सांप से भी जादा खतरनाक और इस खतरनाक का ख़तरा ख़ुद तुम्हे है, तो तुम ख़ुद ही, ख़ुद के लिए सांप से भी जादा खतरनाक हो| सांप को तो तुम मार दोगे, ख़ुद का क्या करोगे | हाँ, अगर भय को मार सको तो न तुम अपने भय से ख़ुद मरोगे न सांप को मारोगे|

तो जो तुमने जान लिया, वह जरूरी नहीं कि सत्य हो, ज़रूरी नहीं कि पूर्ण हो, जिस दिन तुम अपनी जानकारी के आधार पर कोई स्थापना बना लेते हो, किसी पूर्वाग्रह को जन्म दे देते हो, तुम अपनी सृजनात्मकता खत्म कर देते हो, यह पूर्वाग्रह ही रुढी है |

रूढ़ हो जाना ठहर जाना, अपने मष्तिष्क को बंद कर देना, हमारे भीतर की कोमलता को, हमारी विचारशीलता को नष्ट कर देता है | जब मनुष्य रूढ़ हो जाता है, वो हत्यारा बन जाता है, जब समाज रूढ़ हो जाता है, वह बर्बर आतताई और हिंसक हो जाता है| यह परिवर्तन उन्हें ख़ुद नहीं दिखता, क्योकि अपने कृत्य को वो अपने रूढ़ तर्कों से वैलिडेट करने की कोशिश करते है| ठीक वैसे ही, जैसे कुछ थोड़े से विषैले साँपों की वजह से सारे सांपो को विषैला मान उनकी जान ले लेने को आत्मरक्षा के नाम पर हम मनुष्य वैलिडेट करते रहे है, जबकि असल हत्यारे हम ख़ुद है |

पता नहीं दुनिया में सालाना सौ आदमी भी सांप के विष से मरते भी होंगे या नहीं, पर साल डर साल लांखो सांप हम बस अपने भय की वजह से मार डालते है | इसकी वजह हमारे विचारों का रूढ़ हो जाना है, हमने मान लिया यह पृथ्वी बस हमारी है, हमें बचपन से यह अहसास कराया जाता है कि यह पृथ्वी निरापद होनी चाहिए, इस निरापद पृथ्वी के क्या मायने है, यही न कि यहाँ सब कुछ हमारे हिसाब से हो, तो सब कुछ हमारे हिसाब से होने के लिए हम अपने घर को “कीट नियंत्रित” कर देते है | बस एक पल में पृथ्वी पर हमारे घर का एक छोटा सा हिस्सा ही लांखो कीट-पतंगों के लिए निरापद नहीं रह जाता | लाखो किट-पतंगों को आपदा में डालकर, उनकी हत्या कर हम अपने घर को निरापद कहते है | तो जिस घर को हम निरापद घर कहते है, मानते है, वह निरापद हमारे लिए है, हमारी उस जानकारी की सीमा के भीतर निरापद है जितना हम जानते है, वरना इस पृथ्वी के लाखों प्राणियों के लिए वह आपद-घर है|

कीट-पतंगों के लिए उस आपद-घर को निरापद मान, हम उसके बगीचे के फ़ूलों पे मंडराती तितलियाँ ढूंढते है !
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कश्यप किशोर मिश्र 

Monday, June 16, 2014

खुदाई संदेशा

जो शांत चित्त है,
उनसे बहुत से लोग अशांत होंगे ।
जो अहिंसा की बात करेगें,
उनकी हत्या कर दी जाएगी ।
जो मिल-जुल कर रहनें की बात करेगें,
उन्हें अलग-थलग कर दिया जायेगा ।
जिन आँखों में हया होगी,
वो उठनें नहीं पाएगी।
दीन-ईमान की कीमत वो रखेंगे,
जो उसे चंद सिक्को से तौल सकें ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, June 14, 2014

शुरुआत

बोलो ""
अ से अलिफ़ |
अब लिखो ...
"अ"
"अलिफ़ " वाला अ |
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कश्यप किशोर मिश्र 

फ़र्क

ऊँट और गधे में बस एक फ़र्क होता है |
ऊँट गधा नहीं होता : गधा ऊँट नहीं होता |

...बाकी कोई फ़र्क नहीं होता |
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कश्यप किशोर मिश्र

सच का झूठ

जो झूठा है; संभव है उसके पास अपने सच का प्रमाण न हो |
जो सच्चा है; संभव है हमारे पास उसके झूठे होने का प्रमाण न हो |
...बस एक जानकारी स्थिति एकदम उलट देती है | यह जानकारी तीन मिनट में भी सामने आ सकती है और सामने आने में तीन हज़ार साल भी लग सकते है |
संभव है, यह जानकारी मानव-जाति के सामने कभी न आए |
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कश्यप किशोर मिश्र



Monday, June 9, 2014

सवाल :- जीवन क्या है ?

जबाब :- अपने होनें को निरंतर विस्तार देते रहने की प्रक्रिया, जीवन है |

नोट :
*मौत जीवन का एक महत्वपूर्ण ठहराव है, पर किसीके होनें (पहचान) का अंत नहीं है |
*मौत कई बार पहचान के उत्प्रेक यानी कैटलिस्ट एजेंट का कम करती है|
*बाज दफ़ा, मौत पहचान बदल देने का भी कम करती है |
*आज-हम का "अहम्" एक रोग है, बस |
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कश्यप किशोर मिश्र


Saturday, June 7, 2014

...तो हम ख़ुदा को बर्खास्त करते है

अगर कोई मज़हब किसी मजलूम के क़त्ल की इजाज़त देता है, तो ऐसे मजहब में सर जिसकी इबादत में सजदे करते है, वह एक शैतान ही हो सकता है, खुदा नहीं|
किसी मजलूम के क़त्ल की बुनियाद कोई भी हो, काम यह मुसलसल बे-ईमानी है, ये लोग खुदा के बन्दे नहीं हो सकते, ये नाहक ख़ुद को मुसलमान कहते है | जो वाकई मुसलमान हैं, वो मजहब के नाम पर किसी मजलूम का क़त्ल जैसी घटिया और शैतानी इबादत सी हरकते नहीं करते |

एक आदमी की जान से जादा कीमती मज़हब नहीं होता, ऐसी हरकते हमारे मजहब को बजबजाता नाबदान बना देती है | फ़साद करते हुए क़त्ल ओ गारत करना खुदाई मजहब नहीं है |

अगर वाकई खुदा ऐसे किसी क़त्ल की इजाज़त देता है, तो क़यामत के वक़्त इन हत्यारों और इनके खुदा का फ़ैसला, हमारे जैसे अमन पसंद लोग करेगे |
...और तबतक के लिए, ऐसे खुदा को हम बर्खास्त करते है|

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कश्यप किशोर मिश्र


Sunday, May 25, 2014

ओ कलकत्ता ! अर्थात अच्छे दिनों का कलकत्ता...(4)

रामप्रसाद को पार्टी पर्चों की बात समझ नहीं आती, उसके और उसके साथियों के मन में यह सवाल बार-बार उठता अब तो हिन्दुस्तान आजाद है, अब ये लाल झंडा वाले किराँति-किराँति क्यों चिल्लाते रहते है ?
लाल झंडा वालों नें उन्हें समझाया "सारा क्रांतिकारी लोग गोली-बंदूक खा के देश को स्वतंत्र किया, गरीब लोग के लिए, मगर अमीर लोग के लिए गाँधी-नेहरू मिल के गरीब-मजदूर से धोखा किया और स्वतंत्र देश को गणतंत्र कर दिया । हम क्रांति करेंगे और गरीब-मजदूर के लिए देश को फिर से स्वतंत्र करेंगे।"

बात सबके समझ में आ गई ।
कलकत्ता के अच्छे दिनों में गोएबल्स भी शर्मा जाता था ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, May 24, 2014

कामरेड का मतलब

पूरब से आए मजदूरों से, मुख्यतः, आबाद मुहल्ले के चौक पर पार्टी आफिस था, बगल में एक चाय दुकान थी, जिसके चुल्हे पर लिकर चाय सुबह छः से रात एक बजे तक खौलती रहती थी, पार्टी आफिस गर्मी की लम्बी दुपहरी और रात के दौरान युवा लड़कों का कैरम क्लब भी हुआ करता था, यही वजह थी कि किसी ने पार्टी आफिस के बोर्ड के नीचे लिख रखा था "रेडलाइन कैरम कल्ब" ।
बच्चा तब चौथी में पढ़ता था, गर्मियों में टैगोर निकेतन से निकलता तो सीधे घर न जाकर दोपहर पार्टी आफिस में गुजारता, जहाँ उसनें कड़कती धूप की काट में चाय पीना सीख लिया और बढ़ते बढ़ते इस आदत ने बच्चे को थिइक बना दिया, इन दुपहरियों में बच्चे नें शोलोखोव की इंसान का नसीबा से शुरू किया और गोर्की की माँ से होते, तुर्गनेव, टालस्टाय और यहाँ तक की पार्टी के प्रचार पर्चे तक पढ़ जाया करता ।
आफिस में एक होलटाइमर था "मधु" लोग कहते वह सुबह कुल्ला भी दारू से ही करता है, लड़कियों को अजीब निगाहों से देखा करता, दुनिया भर की औरतों से उसके संबंध थे ।
एक दोपहर बच्चे ने मधु को घेरा, बच्चे ने मधु से कहा आप कामरेड अंकल है और कितनी खराब जिंदगी जीते है ।
गरमी खूब थी और मधु ने पी रखी थी, वह बच्चे को कामरेड क्या होता है, उसका जीवन क्या होता है समझाने लगा, वह न जाने क्या क्या बोले जा रहा था, बच्चा कुछ समझ नहीं पाया, अंत में खीझ कर मधु ने कहा "बोका, तुमि किछू बूझे पारछी ना, ओरे बाबा ई कामरेड का जो काम होता है न, ओसका मतलब होता है "फेक्स"(बच्चे ने यही सुना समझा) नही सोमझे ? काम माने लोरकी और रेड माने दारू ।
बच्चे ने उसके बाद मधु से कभी बात नहीं की, दोपहर में किताबों के लिए अब वह रामकृष्ण मठ चला जाता ।
बच्चा अब बड़ा हो चुका है और कलकत्ता अब अच्छे दिनों वाला कलकत्ता भी नहीं रहा । पर कामरेड के अर्थ की बात चले चो उसे हमेशा कामरेड मधु याद आता है, जो पता नहीं कामरेड था या नहीं पर उसने कामरेड के अपने मानी बनाए थे ।

...अच्छे दिनों के कलकत्ता में ऐसा वह अकेला नहीं था ।
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कश्यप किशोर मिश्र 

Friday, May 23, 2014

लिखने का सलीका

हिटलर के बारे में गांधी;
त्याग की शक्ति तो हिंसक भी रख सकता है, हिटलर भी त्यागी कहा जाता है पर वह हिंसा की मूर्ति है, सुना जाता है वह निरामिषहारी है, मुझे यह मानने में दिक्कत है कि वह कैसे इतने कत्ल बर्दाश्त कर लेता है ।
कुछ भी हो, उसका जीवन त्याग से भरा बतलाया जाता है, वह निर्वयसनी है, उसने शादी नहीं की है, उसका आचरण साफ बतलाया जाता है, वह बहुत जागृत रहता है । पर हममें त्याग और अहिंसा दोनों चाहिए, अहिंसा का अर्थ है प्रेम ।
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पार्टी में समझया गया, इसे ऐसे लिखते है :
हिटलर के बारे में गांधी-
"उसमें कोई पाप नहीं है, उसने शादी नहीं की है, कहा जाता है, उसका चरित्र स्वच्छ है"।

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कश्यप किशोर मिश्र 

Wednesday, May 21, 2014

स्टालिन और हिटलर

स्टालिन और हिटलर एक दूसरे के पोषक थे, हिटलर ने रूस पर हमला नहीं किया होता तो स्टालिन को हिटलर से कोई मुश्किल नहीं थी ।
यह स्थिति तब थी, जब हिटलर जर्मनी में कम्युनिस्टों का कत्ल करवा रहा था ।
रूस और जर्मनी की जंग दो परस्पर विरोधी विचारधारा की जंग न होकर, दो साम्राज्यवादी राष्ट्रों की जंग थी ।
कम्युनिस्ट रूस ने फासिष्ट हिटलर का विरोध कभी नहीं किया बल्कि रूस ने जंग उस हिटलर के खिलाफ लड़ी, जिसने रूस पर हमला किया था ।

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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, May 20, 2014

मेरा वतन

इस मुल्क में एक शहर था कलकत्ता...
जिसके अच्छे दिनों का एक करीब तीस साला दौर चला |
यह शहर, हलाकि, था हिन्दुस्तान में ही,
पर वहाँ अच्छे दिन लाने वाले बाबू लोग 

अपनी अपनी आस्था के हिसाब से, 
चीन या रूस का नक्शा देखते ही कह उठते थे 
"ओह ! मेरा वतन"

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कश्यप किशोर मिश्र 

नजरिया

वीरान रेगिस्तान में दो दरवेश  बैठे बात कर रहे थे, दूर तक फैले वीराने को देखते, पहले दरवेश ने लम्बी साँस भरी और कहा, यहाँ सबकुछ कितना वीरान है, जीवन का नामोनिशान तक नहीं है|

दूसरा दरवेश जो बुजुर्ग था, उन पत्थरों को उलटने-पुलटने लगा, जिनपर वो बैठे थे, रात की ओस पत्थरों की तली में मौजूद थी, एक पत्थर तले एक अंकुरित बीज दिखा, बुजुर्ग दरवेश  ने उसे दिखा कर कहा देखो, यहाँ जीवन है|

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कश्यप किशोर मिश्र 


Saturday, February 22, 2014

गेहूं और बथुआ

हर कथन के तीन पक्ष होते है, अपना पक्ष, दूसरे का पक्ष और सच का पक्ष | तीसरा पक्ष सबसे अहम् होता है, पर सबसे जादा अनदेखा किया जाने वाला पक्ष यही होता है |

खेत जोटा जाता है, गेहूं के लिए, खाद-पानी-बीज गेहूं का होता है, पर उग आता है, बथुआ भी| खेत में दो पक्ष बन जाते है | गेहूं के और बथुआ के | बथुआ एक एक पोरसा लम्बा हो जाता है | इतना तेज बढ़ता है, कि रोका न जाए तो गेहूं को दाब दे | गेहूं की ज़मीन-खाद-पानी सब पे कब्ज़ा कर लेता है |

गेहूं यह देखता है और देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उधर बथुआ हरियाला होता जाता है | दुनिया गेहूं-बथुआ के इस खेल को अपनी नज़र से देखती है और पीड़क-पीड़ीत को अपने हिसाब से परिभाषित करती है|

एक दिन किसान आता है, सोहनी के लिए, वह बथुआ खोट लेता है | गेहूं की रोटी के साथ बथुआ का साग खाता है |

खेत-खाद-पानी-बीज सब किसान की मेहनत का नतीजा है | वह सोहनी के दौरान बथुआ खूंटता है और कटाई के वक्त गेहूं काटता है |

...बस खूटने और काटने का समय अलग-अलग होता है |

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कश्यप किशोर मिश्र


Thursday, February 20, 2014

मेरी दादी

बच्चे आपस में बात कर रहे थे

पहला बच्चा - मेरी दादी की कहानियो में एक राजा होता था, उसकी सात रानियाँ होती थी, छोटी रानी सबसे खूबसूरत होती थी, वह राजा की सबसे चहेती होती थी |

दूसरा बच्चा - मेरी दादी की कहानियो में एक चिड़ा होता था, एक चिड़िया होती थी, उनके दो बच्चे होते थे |

तीसरा बच्चा - मेरी दादी बस एक कहानी थी !

बाकी दोनों बच्चे- हाँ, हाँ हमारी दादी भी बस एक कहानी ही थी | 

Wednesday, February 19, 2014

औरत क्या बस औरत नहीं हो सकती ?

औरतो को सामान मान लिया जाता है, जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल करो, इस बात की जड़े इतनी गहरी है कि जबकि दोनों वाक्यों का मतलब वही होगा, पर अपने अवचेतन में हमेशा हम वाक्य संख्या 1) का इस्तेमाल ही करते है | "हमारी औरते" या "अपनी औरते" |

1) अगर तुम जानना चाहते हो कोई समाज कितना सभ्य है, तो यह देखो वह अपनी औरतों से कैसे पेश आता है | 

2)अगर तुम जानना चाहते हो कोई समाज कितना सभ्य है, तो यह देखो वह औरतों से कैसे पेश आता है | 

औरते क्या बस "औरते" नहीं हो सकती |
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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 18, 2014

जो है !

ग़म को ग़म मानो ;- जिंदगी सचमुच खूबसूरत है, पर उस ख़ूबसूरती की खाद-पानी हमारी मुहताज है;- और सुख को सुख मानो !

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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 11, 2014

होते होते रह गई क्रांतियाँ


मन क्रांतिकारी -क्रन्तिकारी हो रहा हो, तो चाय लाजिम है |
अक्सर क्रन्तिकारी मन को समय पे मिल गई कड़क चाय ने क्रांति में उबाल लाने का काम किया है |
कड़क चाय और पटियाला पैग का क्रांति में अमिट योगदान रहा है |
न जाने कई क्रांतिकारी बहस, चाय के आने तक मुल्तवी रही |

ऐसा भी हुआ, चाय नहीं मिल पाई और क्रांति होते होते रह गई |
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कश्यप किशोर मिश्र 

Saturday, February 8, 2014

सबका बराबर हक़

आदमियों के बीच बहस जारी थी, जो बाद में अदावत में बदल गई कि आदमियों में जो ऊँची जातियाँ है उनके मुकाबले तो दलित जातियां है, उनको उनका हक़ मिलना ही चाहिए| जिन लोगों के कब्जे में, संसाधन थे वे उनसे अपना नियंत्रण हटाने में मुश्किल महसूस कर रहे थे और जो दलित थे, उन्हें सदियों से अपने दबे-कुचले होने का प्रतिकर भी चाहिए था और अपना हक़ भी| यह बात कही से गलत भी नहीं थी| "आखिर सबको अपना हक़ चाहिए ही" |

इस बात को लेकर आदमियों के बीच ख़ूब हंगामा बरपा हुआ था | सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हर मुद्दे "सबको उसका हक़" की बात कर रहे थे |

बात जंगल तक पहुंची | समन्दरो तक पहुची | पहाड़ो की चोटियों तक पहुंची|

बात थी "सबको उसका हक़" तो वे जंगलात जो तामीरी लकडियो के लिए काटे जाते थे, सवाल करने लगे "क्या उनका इस पृथ्वी पर फलने-फूलने का हक़ नहीं" उन्हें लगातार काट-काट कर ख़तम क्यों किया जा रहा है|

जानवर जो जंगलों की हद तक सिमटे हुए थे सवाल करने लगे "ये जमीन, ये जंगल क्या हमारे भी नहीं ?" क्या हमें यह हक़ नहीं की आदमियों की तरह हम भी तय करे, हमारी क्या ज़रूरत है, क्या यह पृथ्वी अकेले आदमियों की है?"

परिंदे अपने लिए आकाश मागने लगे और मछलियाँ अपने लिए साफ़ नदी तालाब और समंदर |

सबने जानवरों को अपना सन्देशा "लुटेरे-आदमियों" तक पहुचाने को कहा और जंगल के जानवर अपनी और अपनों की बात लेकर एक गुट में अपने हक़ की बात करने बस्तियों की तरफ बढ़े |

बस्तियों में हंगामा बरपा था, तमाम जंगली जानवर बस्तियों की जानिब आ रहे है और नारे लगा रहे है "यह पृथ्वी हमारी भी है" आदमियों ने अपनी सारी अदावत भुला दी और एकजुट हो गए| उन्होंने जानवरों को खदेड़ लिया| कुछ जानवर मारे गए, कुछ घायल हुए कुछ पहले ही भाग खड़े होने की वजह से साफ़ बच गए | बहरहाल आदमियों का ख़तरा टल गया |

आदमियों ने पहला काम किया, बस्तियों के करीब जो जंगल थे, उन्हें खूब दूर तक काट डाला और बस्तियों को अपने लिए निरापद बना लिया |

...अब आदमी आपस में "सबको अपना हक़ चाहिए" के मसले पर गंभीर है | 


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कश्यप किशोर मिश्र 

Friday, February 7, 2014

फ़ैसला

जीवन में, कई बार और बहुधा बार -बार, हम फैसला पहले ले लेते है | 
गवाहियों और सबूतों को, उस फ़ैसले के मुताबिक सजा देते है |
अपने फ़ैसले की खिलाफत करती गवाहिया और सबूत हमें झूठ जान पड़ते है |

झूठें हम होते है पर यह असल फैसला हम कभी नहीं लेते !

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कश्यप किशोर मिश्र 

Wednesday, February 5, 2014

हजरत गब्बर और उनका दल-बल

गब्बर= ओ रे कालिया तेरी बीबी अब भी तुझको पीटती है, का रे ?
कालिया= सरदार! हमरे बीच मार-कुटाई तो कभी नहीं होती थी !
गब्बर = चोप्प हरामखोर! जबाब हां या ना में दो |

(तभी बीच में बसंती आ जाती है)
बसंती= यूँ है, कि सरदार इसका मतलब यह हुआ कि हाँ बुलवाकर या ना बुलवाकर किसी भी तरह से तुम कालिया की बीबी को झगडालू दिखाना चाहते हो ! ये तो सरासर गलत बात है, गब्बर!

(दृष्य बदलता है और गब्बर गाववालो के बीच में है, कालिया और बसंती रस्सियों से बंधे हुए है)
गब्बर= सुनो -सुनो गावँ वालों, ई जो बसंती है न उसका कालिया से प्रेम चल रहा है, ई तो कालिया की बीबी से सरासर नाइंसाफी है |

(कालिया की बीबी दौड़ती आती है)
कालिया की बीबी= नहीं सरदार ! यह बात सरासर झूठ है |
गब्बर (चीखते हुए) - सूअर के बच्चो, सब के सब मिले हुए है, सब के सब अपराधी है |

गब्बर ने बन्दूक निकाली और गोलिया दाग दी | धाय-धाय -धाय ! कालिया, उसकी पत्नी और बसंती मारे जाते है |
गब्बर (स्वगत)- अरे, यह बन्दूक चलती भी है!
शान्भा- सरदार की जय हो ! सरदार ने गावँ को भ्रष्टाचारियो की अराजकता से मुक्त कर दिया |

(गावँ वाले नारे लगाते है "हजरत गब्बर की जय हो, हजरत गब्बर की जय हो"
नेपथ्य में गब्बर के गुण्डे उन लोगो की पिटाई कर रहे है, जो सच्ची बात कहना चाहते है|)


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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 4, 2014

क्रांति के विरोधी

किरान्तिकारी को बड़ा क्रोध हो रहा था, धूप की चटक उसकी खोपड़ी को गरम किये दे रही थी | उसने जोर जोर से नारे लगाये "किरांती जिंदाबाद" "किरांती जिंदाबाद" उसने इधर उधर देखा, ऊपर नीचे देखा, आगे पीछे देखा |कही किरांती होती नज़र नहीं आई | 

किरान्तिकारी ने तय किया अब वक़्त मरने-मारने का आ चुका है और अब उसे ही कुछ करना होगा |
उसने पिस्तौल निकाली और किरांती- किरांती चिल्लाता दौड़ पड़ा | सामने जुता खेत था | किरान्तिकारी ने जबसे दिमाग सम्हाला था, बस किरांती की थी| खेत खलिहान से उसका कोई सम्बन्ध रहा ही नहीं था| जुते खेत में वह दौड़ नहीं पाया और गिर पड़ा |

उसे गिरते देख, हल चला रहे किसान हँस पड़े | किरान्तिकारी उठा उसने अपनी पिस्तौल सम्हाली और किसानो पर पिस्तौल दाग दी | धायं! धाय! की आवाज के साथ हँसते किसान निष्प्राण हो गए |

किरान्तिकारी ने पिस्तौल से उठते धुंवे के बीच नली में एक फूंक मारी और बड़ी ही वितृष्णा से किसानो को देखते हुए सोचा "क्रांति के विरोधी " और बड़े संतोष से आगे बढ़ गया |

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कश्यप किशोर मिश्र 

Monday, February 3, 2014

हत्यारों के भेद

दुनिया में "हत्यारे" दो तरह के है ;-
पहले;- जो बेहद ईमानदार है और विचारधारा (वो कैसी भी और कोई भी हो) से जुडी हत्याए करते है 
दूसरे ;- कम्जर्फ़ है और विचारहीन हत्याए करते है |

जबकि "हत" बस एक तरह के होते है, जो दोनों तरह के हत्यारों द्वारा मारे जाते है !
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कश्यप किशोर मिश्र 

Wednesday, January 1, 2014

उम्मीद मुर्दों के बीच भी, एक जिन्दा शब्द है...

हर साल बिलकुल वैसा ही होता है, जैसे बीत चला साल | बस तारीख बदलती है,लोग और उनकी वासनाये जस की तस रहती है | तब जब उम्मीदे निराशा की धुंध से ढकी हुई हो, ऐसे में ग़ालिब का "एक बिरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है" सुनना बड़ा सुकूनदेह लगता है |

बरसो से हर नया साल बेहतर होगा की उम्मीद से शुरू करते है और साल के अंत का लेखा-जोखा कही से पुराने बीत चुके सालों से कुछ अलग नहीं होता, तब भी न सिर्फ अपने लिए, बल्कि दुसरे लोगो को भी दिलासा देते हम उम्मीद जरूर जताते है, आने वाला साल अच्छा होगा |

पर बड़े लोग, उस बिरहमन को ढूंढे फिरे है, जिसने कह रखा है "ये साल अच्छा है" गोकि चचा ग़ालिब ने लिख तो दिया इक बिरहमन, पर ये तो लिखा नहीं कि वो बिरहमन है, कौन जिसने कह दिया कि "ये साल अच्छा है"

तो भाई लोग, ऊ बिरहमन हमी रहे, और हम कि कश्यप किशोर मिश्र वल्द चंद्रमौली मिश्र, साकिन मौजा परसिया, तप्पा-खुटहन, परगना-धुरियापार, तहसील गोला, ज़िला-गोरखपुर पुरे होशो हवास में यह सनद करता हूँ कि मेरे अलावे इस दावे कि "ये साल अच्छा है" किसी और बिरहमन की जुबान, ख्याल और कलम का कोई हाथ या साथ बिलकुल नहीं है |

इस दावे की वजह भी बड़ी मामूल है, और वो यूँ, कि जब हम निरे बच्चे रहे, और अपने गावँ से अपने छावनी (ग्राम-कोरड, तप्पा-सेमर, परगना-चिल्लूपार, तहसील-गोला, ज़िला-गोरखपुर) की जानिब अपनी दादी, जिनके लिए "पोथी पीढ़ा और अक्षर कीड़ा" हुआ करता रहा, के साथ जाते रहे, तो जब हमारे छोटे छोटे कदम ठक जाते थे, तो दादी कहती, बस उस अगले गावँ तक...| उसके आगे अपनी छावनी है और ऐसा कहते कहते वो हम कि एक छोटे से बच्चे को कई कोस चला ले जाती |

तो भाई लोगो, अपने बचपने में, अपनी अनपढ़ दादी से हमने सीखा, उम्मीद बड़ी ताकतवर शै है | यह हमने किसी पोथी-पत्रा से नहीं सीखा | लिहाजा जब आप "एक बिरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है" सुनकर उसके बिरहमन को ढूढने चले तो दोष उसकी उस पढाई को मत दीजियेगा, जो उसने अपनी पोथियो से सीखी, यह बात उस बिरहमन यानी कि हम ने अपनी अनपढ़ दादी से, अपने बचपने में सीखी थी, कि "उम्मीद मुर्दों के बीच भी, एक जिन्दा शब्द है"...!
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कश्यप किशोर मिश्र