Tuesday, June 17, 2014

जानकारी से भी अज्ञान उपजता है

जो तुम देख रहे हो, वह वही है, इस बात का क्या भरोसा ? हो सकता है वह कुछ और हो और तुम्हे बताया कुछ और गया हो, इसे प्रमाणित कौन करेगा कि जो तुम्हे बताया गया है, जो तुम जानते हो वह पूर्ण सत्य है | तुम्हे सांप खतरनाक दिखता है, उसमे विषदंत होते है| यह तुम्हारी जानकारी है, कि सांप एक बहुत ही खतरनाक प्राणी है और यह डंस ले तो आदमी मर जाता है, लिहाजा तुम सांप देखते हो और उसे मार देते हो |

तुम्हारी स्थापनाए कितनी झूठी है, यह कौन तय करेगा ? क्योकि तुमने जिन जानकारियों से अपने पूर्वाग्रह तय कर लिए है, वे जानकारिया भी झूठी हो सकती है | जिस विष की वजह से तुम सांप को खतरनाक मानते हो, वह विष, अस्सी प्रतिशत से भी जादा साँपों में होता ही नहीं और साँप के काटने से मरने वाले लोगो का एक बड़ा हिस्सा सांप के ज़हर से न मर कर भय से मरता है |

जादा खतरनाक कौन है, विष या भय ? चलो मान लेते है दुनिया में कुछ सांप विषैले हैं और उसकी वजह से वे सांप खतरनाक है, उन विषैले साँपों की वजह से कुछ व्यक्तियों की मौत भी होती है, पर उस भय का क्या ? जिस भय की वजह से आदमी सदमे में आकर मर जाता है, यह भय तो आदमी के भीतर है | यह भय सांप के विष से भी जादा खतरनाक है, जो तुम्हारे भीतर है | तो तुम्हारे लिए जादा ख़तरनाक क्या हुआ, सांप का विष या तुम्हारे भीतर समाया भय|

अगर सांप अपने विष की वजह से खतरनाक है, तो उससे जादा खतरनाक भय जो तुमने अपने भीतर पाल-पोस रखा है, उसकी वजह से तुम भी तो खतरनाक हो, सांप से भी जादा खतरनाक और इस खतरनाक का ख़तरा ख़ुद तुम्हे है, तो तुम ख़ुद ही, ख़ुद के लिए सांप से भी जादा खतरनाक हो| सांप को तो तुम मार दोगे, ख़ुद का क्या करोगे | हाँ, अगर भय को मार सको तो न तुम अपने भय से ख़ुद मरोगे न सांप को मारोगे|

तो जो तुमने जान लिया, वह जरूरी नहीं कि सत्य हो, ज़रूरी नहीं कि पूर्ण हो, जिस दिन तुम अपनी जानकारी के आधार पर कोई स्थापना बना लेते हो, किसी पूर्वाग्रह को जन्म दे देते हो, तुम अपनी सृजनात्मकता खत्म कर देते हो, यह पूर्वाग्रह ही रुढी है |

रूढ़ हो जाना ठहर जाना, अपने मष्तिष्क को बंद कर देना, हमारे भीतर की कोमलता को, हमारी विचारशीलता को नष्ट कर देता है | जब मनुष्य रूढ़ हो जाता है, वो हत्यारा बन जाता है, जब समाज रूढ़ हो जाता है, वह बर्बर आतताई और हिंसक हो जाता है| यह परिवर्तन उन्हें ख़ुद नहीं दिखता, क्योकि अपने कृत्य को वो अपने रूढ़ तर्कों से वैलिडेट करने की कोशिश करते है| ठीक वैसे ही, जैसे कुछ थोड़े से विषैले साँपों की वजह से सारे सांपो को विषैला मान उनकी जान ले लेने को आत्मरक्षा के नाम पर हम मनुष्य वैलिडेट करते रहे है, जबकि असल हत्यारे हम ख़ुद है |

पता नहीं दुनिया में सालाना सौ आदमी भी सांप के विष से मरते भी होंगे या नहीं, पर साल डर साल लांखो सांप हम बस अपने भय की वजह से मार डालते है | इसकी वजह हमारे विचारों का रूढ़ हो जाना है, हमने मान लिया यह पृथ्वी बस हमारी है, हमें बचपन से यह अहसास कराया जाता है कि यह पृथ्वी निरापद होनी चाहिए, इस निरापद पृथ्वी के क्या मायने है, यही न कि यहाँ सब कुछ हमारे हिसाब से हो, तो सब कुछ हमारे हिसाब से होने के लिए हम अपने घर को “कीट नियंत्रित” कर देते है | बस एक पल में पृथ्वी पर हमारे घर का एक छोटा सा हिस्सा ही लांखो कीट-पतंगों के लिए निरापद नहीं रह जाता | लाखो किट-पतंगों को आपदा में डालकर, उनकी हत्या कर हम अपने घर को निरापद कहते है | तो जिस घर को हम निरापद घर कहते है, मानते है, वह निरापद हमारे लिए है, हमारी उस जानकारी की सीमा के भीतर निरापद है जितना हम जानते है, वरना इस पृथ्वी के लाखों प्राणियों के लिए वह आपद-घर है|

कीट-पतंगों के लिए उस आपद-घर को निरापद मान, हम उसके बगीचे के फ़ूलों पे मंडराती तितलियाँ ढूंढते है !
_______________
कश्यप किशोर मिश्र 

No comments: