Saturday, February 22, 2014

गेहूं और बथुआ

हर कथन के तीन पक्ष होते है, अपना पक्ष, दूसरे का पक्ष और सच का पक्ष | तीसरा पक्ष सबसे अहम् होता है, पर सबसे जादा अनदेखा किया जाने वाला पक्ष यही होता है |

खेत जोटा जाता है, गेहूं के लिए, खाद-पानी-बीज गेहूं का होता है, पर उग आता है, बथुआ भी| खेत में दो पक्ष बन जाते है | गेहूं के और बथुआ के | बथुआ एक एक पोरसा लम्बा हो जाता है | इतना तेज बढ़ता है, कि रोका न जाए तो गेहूं को दाब दे | गेहूं की ज़मीन-खाद-पानी सब पे कब्ज़ा कर लेता है |

गेहूं यह देखता है और देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उधर बथुआ हरियाला होता जाता है | दुनिया गेहूं-बथुआ के इस खेल को अपनी नज़र से देखती है और पीड़क-पीड़ीत को अपने हिसाब से परिभाषित करती है|

एक दिन किसान आता है, सोहनी के लिए, वह बथुआ खोट लेता है | गेहूं की रोटी के साथ बथुआ का साग खाता है |

खेत-खाद-पानी-बीज सब किसान की मेहनत का नतीजा है | वह सोहनी के दौरान बथुआ खूंटता है और कटाई के वक्त गेहूं काटता है |

...बस खूटने और काटने का समय अलग-अलग होता है |

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कश्यप किशोर मिश्र


1 comment:

Amit Kumar Nema said...

अनुभव पर आधारित सारगर्भित लघुकथा ! बहुत बढ़िया