Tuesday, May 20, 2014

नजरिया

वीरान रेगिस्तान में दो दरवेश  बैठे बात कर रहे थे, दूर तक फैले वीराने को देखते, पहले दरवेश ने लम्बी साँस भरी और कहा, यहाँ सबकुछ कितना वीरान है, जीवन का नामोनिशान तक नहीं है|

दूसरा दरवेश जो बुजुर्ग था, उन पत्थरों को उलटने-पुलटने लगा, जिनपर वो बैठे थे, रात की ओस पत्थरों की तली में मौजूद थी, एक पत्थर तले एक अंकुरित बीज दिखा, बुजुर्ग दरवेश  ने उसे दिखा कर कहा देखो, यहाँ जीवन है|

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कश्यप किशोर मिश्र 


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