Saturday, May 24, 2014

कामरेड का मतलब

पूरब से आए मजदूरों से, मुख्यतः, आबाद मुहल्ले के चौक पर पार्टी आफिस था, बगल में एक चाय दुकान थी, जिसके चुल्हे पर लिकर चाय सुबह छः से रात एक बजे तक खौलती रहती थी, पार्टी आफिस गर्मी की लम्बी दुपहरी और रात के दौरान युवा लड़कों का कैरम क्लब भी हुआ करता था, यही वजह थी कि किसी ने पार्टी आफिस के बोर्ड के नीचे लिख रखा था "रेडलाइन कैरम कल्ब" ।
बच्चा तब चौथी में पढ़ता था, गर्मियों में टैगोर निकेतन से निकलता तो सीधे घर न जाकर दोपहर पार्टी आफिस में गुजारता, जहाँ उसनें कड़कती धूप की काट में चाय पीना सीख लिया और बढ़ते बढ़ते इस आदत ने बच्चे को थिइक बना दिया, इन दुपहरियों में बच्चे नें शोलोखोव की इंसान का नसीबा से शुरू किया और गोर्की की माँ से होते, तुर्गनेव, टालस्टाय और यहाँ तक की पार्टी के प्रचार पर्चे तक पढ़ जाया करता ।
आफिस में एक होलटाइमर था "मधु" लोग कहते वह सुबह कुल्ला भी दारू से ही करता है, लड़कियों को अजीब निगाहों से देखा करता, दुनिया भर की औरतों से उसके संबंध थे ।
एक दोपहर बच्चे ने मधु को घेरा, बच्चे ने मधु से कहा आप कामरेड अंकल है और कितनी खराब जिंदगी जीते है ।
गरमी खूब थी और मधु ने पी रखी थी, वह बच्चे को कामरेड क्या होता है, उसका जीवन क्या होता है समझाने लगा, वह न जाने क्या क्या बोले जा रहा था, बच्चा कुछ समझ नहीं पाया, अंत में खीझ कर मधु ने कहा "बोका, तुमि किछू बूझे पारछी ना, ओरे बाबा ई कामरेड का जो काम होता है न, ओसका मतलब होता है "फेक्स"(बच्चे ने यही सुना समझा) नही सोमझे ? काम माने लोरकी और रेड माने दारू ।
बच्चे ने उसके बाद मधु से कभी बात नहीं की, दोपहर में किताबों के लिए अब वह रामकृष्ण मठ चला जाता ।
बच्चा अब बड़ा हो चुका है और कलकत्ता अब अच्छे दिनों वाला कलकत्ता भी नहीं रहा । पर कामरेड के अर्थ की बात चले चो उसे हमेशा कामरेड मधु याद आता है, जो पता नहीं कामरेड था या नहीं पर उसने कामरेड के अपने मानी बनाए थे ।

...अच्छे दिनों के कलकत्ता में ऐसा वह अकेला नहीं था ।
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कश्यप किशोर मिश्र 

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