युवक नया-नया शहर
में आया था, यूँ ही टहलते टहलते वह एक संस्थान के भीतर टहलने लगा, सुबह का वक्त
था, संस्थान के भीतर खूब सारे लोग टहल रहे थे, टहलते टहलते आदतन उसने एक सिगरेट
सुलगा ली, सामने से एक बुजुर्ग सज्जन आते दिखे, उन्हें देख कर लोग अदब से राह से
हट जा रहे थे, जिससे युवक ने अनुमान लगाया वह संभवतः संस्थान में किसी प्रतिष्ठापूर्ण
पद पर होंगे|
बुजुर्ग सज्जन जब
करीब आ गए तो शालीनता वश युवक ने सिगरेट पीछे कर लिया| बुजुर्ग युवक के करीब आए और
सहज मुस्कराहट से उन्होंने पूछा “आप शायद यहाँ नए है?”
युवक ने शालीनता से जबाब दिया “जी, पहली बार आया हूँ !”
तो बुजुर्ग ने कहाँ “हाँ
! तभी आपको नहीं पता, यहाँ धुम्रपान निषेध है”
और एक बार पुनः युवक पर सहज वात्सल्यपूर्ण मुस्कराहट डालकर आगे बढ़ गए |
युवक मुदित-चकित भाव
से बुजुर्ग को देखता रहा, “निषेध है”
बस बता कर बुजुर्ग आगे बढ़ गए, यह बता देना कितना सहज था, अबतक उसने यही देखा था कि
मनाही के साथ-साथ मना करने वाला अपना रौब भी दिखाता था, कभी-कभी यह भी होता था कि
मनाही करने वाला मोहलत भी देने लगता “खैर, पहली बार है,पी लीजिये पर आइन्दा याद
रखियेगा कि यहाँ मनाही है” कुल मिला कर मनाही करने वाला उस मनाही के
बहाने ख़ुद के होने की स्थापना करता था, जबकि यह बुजुर्ग जो है, बस वह बाता कर आगे
बढ़ गए |
अगली सुबह युवक टहलने
निकला तो उसके पाँव पुनः उसी तरफ बढ़ चले, टहलते-टहलते अनायास ही अवचेतन में ही पल
रही आदत के वश उसने सिगरेट सुलगा ली और इसका ध्यान तब आया जब बुजुर्ग सामने ही दिख
गए, युवक की दशा मानो काटो तो खून नहीं वाली थी, बुजुर्ग ने युवक को देखा, एक
परिचित मुस्कराहट डाली और कहा “आपको दुबारा देख कर अच्छा लगा, यहाँ
धुम्रपान निषेध है”
और आगे बढ़ गए |
_______________कश्यप किशोर मिश्र
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