आदमियों के बीच बहस जारी थी, जो बाद में अदावत में बदल गई कि आदमियों में जो ऊँची जातियाँ है उनके मुकाबले तो दलित जातियां है, उनको उनका हक़ मिलना ही चाहिए| जिन लोगों के कब्जे में, संसाधन थे वे उनसे अपना नियंत्रण हटाने में मुश्किल महसूस कर रहे थे और जो दलित थे, उन्हें सदियों से अपने दबे-कुचले होने का प्रतिकर भी चाहिए था और अपना हक़ भी| यह बात कही से गलत भी नहीं थी| "आखिर सबको अपना हक़ चाहिए ही" |
इस बात को लेकर आदमियों के बीच ख़ूब हंगामा बरपा हुआ था | सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हर मुद्दे "सबको उसका हक़" की बात कर रहे थे |
बात जंगल तक पहुंची | समन्दरो तक पहुची | पहाड़ो की चोटियों तक पहुंची|
बात थी "सबको उसका हक़" तो वे जंगलात जो तामीरी लकडियो के लिए काटे जाते थे, सवाल करने लगे "क्या उनका इस पृथ्वी पर फलने-फूलने का हक़ नहीं" उन्हें लगातार काट-काट कर ख़तम क्यों किया जा रहा है|
जानवर जो जंगलों की हद तक सिमटे हुए थे सवाल करने लगे "ये जमीन, ये जंगल क्या हमारे भी नहीं ?" क्या हमें यह हक़ नहीं की आदमियों की तरह हम भी तय करे, हमारी क्या ज़रूरत है, क्या यह पृथ्वी अकेले आदमियों की है?"
परिंदे अपने लिए आकाश मागने लगे और मछलियाँ अपने लिए साफ़ नदी तालाब और समंदर |
सबने जानवरों को अपना सन्देशा "लुटेरे-आदमियों" तक पहुचाने को कहा और जंगल के जानवर अपनी और अपनों की बात लेकर एक गुट में अपने हक़ की बात करने बस्तियों की तरफ बढ़े |
बस्तियों में हंगामा बरपा था, तमाम जंगली जानवर बस्तियों की जानिब आ रहे है और नारे लगा रहे है "यह पृथ्वी हमारी भी है" आदमियों ने अपनी सारी अदावत भुला दी और एकजुट हो गए| उन्होंने जानवरों को खदेड़ लिया| कुछ जानवर मारे गए, कुछ घायल हुए कुछ पहले ही भाग खड़े होने की वजह से साफ़ बच गए | बहरहाल आदमियों का ख़तरा टल गया |
आदमियों ने पहला काम किया, बस्तियों के करीब जो जंगल थे, उन्हें खूब दूर तक काट डाला और बस्तियों को अपने लिए निरापद बना लिया |
...अब आदमी आपस में "सबको अपना हक़ चाहिए" के मसले पर गंभीर है |
______________
कश्यप किशोर मिश्र
इस बात को लेकर आदमियों के बीच ख़ूब हंगामा बरपा हुआ था | सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हर मुद्दे "सबको उसका हक़" की बात कर रहे थे |
बात जंगल तक पहुंची | समन्दरो तक पहुची | पहाड़ो की चोटियों तक पहुंची|
बात थी "सबको उसका हक़" तो वे जंगलात जो तामीरी लकडियो के लिए काटे जाते थे, सवाल करने लगे "क्या उनका इस पृथ्वी पर फलने-फूलने का हक़ नहीं" उन्हें लगातार काट-काट कर ख़तम क्यों किया जा रहा है|
जानवर जो जंगलों की हद तक सिमटे हुए थे सवाल करने लगे "ये जमीन, ये जंगल क्या हमारे भी नहीं ?" क्या हमें यह हक़ नहीं की आदमियों की तरह हम भी तय करे, हमारी क्या ज़रूरत है, क्या यह पृथ्वी अकेले आदमियों की है?"
परिंदे अपने लिए आकाश मागने लगे और मछलियाँ अपने लिए साफ़ नदी तालाब और समंदर |
सबने जानवरों को अपना सन्देशा "लुटेरे-आदमियों" तक पहुचाने को कहा और जंगल के जानवर अपनी और अपनों की बात लेकर एक गुट में अपने हक़ की बात करने बस्तियों की तरफ बढ़े |
बस्तियों में हंगामा बरपा था, तमाम जंगली जानवर बस्तियों की जानिब आ रहे है और नारे लगा रहे है "यह पृथ्वी हमारी भी है" आदमियों ने अपनी सारी अदावत भुला दी और एकजुट हो गए| उन्होंने जानवरों को खदेड़ लिया| कुछ जानवर मारे गए, कुछ घायल हुए कुछ पहले ही भाग खड़े होने की वजह से साफ़ बच गए | बहरहाल आदमियों का ख़तरा टल गया |
आदमियों ने पहला काम किया, बस्तियों के करीब जो जंगल थे, उन्हें खूब दूर तक काट डाला और बस्तियों को अपने लिए निरापद बना लिया |
...अब आदमी आपस में "सबको अपना हक़ चाहिए" के मसले पर गंभीर है |
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कश्यप किशोर मिश्र
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