हर साल बिलकुल वैसा ही होता है, जैसे बीत चला साल | बस तारीख बदलती है,लोग और उनकी वासनाये जस की तस रहती है | तब जब उम्मीदे निराशा की धुंध से ढकी हुई हो, ऐसे में ग़ालिब का "एक बिरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है" सुनना बड़ा सुकूनदेह लगता है |
बरसो से हर नया साल बेहतर होगा की उम्मीद से शुरू करते है और साल के अंत का लेखा-जोखा कही से पुराने बीत चुके सालों से कुछ अलग नहीं होता, तब भी न सिर्फ अपने लिए, बल्कि दुसरे लोगो को भी दिलासा देते हम उम्मीद जरूर जताते है, आने वाला साल अच्छा होगा |
पर बड़े लोग, उस बिरहमन को ढूंढे फिरे है, जिसने कह रखा है "ये साल अच्छा है" गोकि चचा ग़ालिब ने लिख तो दिया इक बिरहमन, पर ये तो लिखा नहीं कि वो बिरहमन है, कौन जिसने कह दिया कि "ये साल अच्छा है"
तो भाई लोग, ऊ बिरहमन हमी रहे, और हम कि कश्यप किशोर मिश्र वल्द चंद्रमौली मिश्र, साकिन मौजा परसिया, तप्पा-खुटहन, परगना-धुरियापार, तहसील गोला, ज़िला-गोरखपुर पुरे होशो हवास में यह सनद करता हूँ कि मेरे अलावे इस दावे कि "ये साल अच्छा है" किसी और बिरहमन की जुबान, ख्याल और कलम का कोई हाथ या साथ बिलकुल नहीं है |
इस दावे की वजह भी बड़ी मामूल है, और वो यूँ, कि जब हम निरे बच्चे रहे, और अपने गावँ से अपने छावनी (ग्राम-कोरड, तप्पा-सेमर, परगना-चिल्लूपार, तहसील-गोला, ज़िला-गोरखपुर) की जानिब अपनी दादी, जिनके लिए "पोथी पीढ़ा और अक्षर कीड़ा" हुआ करता रहा, के साथ जाते रहे, तो जब हमारे छोटे छोटे कदम ठक जाते थे, तो दादी कहती, बस उस अगले गावँ तक...| उसके आगे अपनी छावनी है और ऐसा कहते कहते वो हम कि एक छोटे से बच्चे को कई कोस चला ले जाती |
तो भाई लोगो, अपने बचपने में, अपनी अनपढ़ दादी से हमने सीखा, उम्मीद बड़ी ताकतवर शै है | यह हमने किसी पोथी-पत्रा से नहीं सीखा | लिहाजा जब आप "एक बिरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है" सुनकर उसके बिरहमन को ढूढने चले तो दोष उसकी उस पढाई को मत दीजियेगा, जो उसने अपनी पोथियो से सीखी, यह बात उस बिरहमन यानी कि हम ने अपनी अनपढ़ दादी से, अपने बचपने में सीखी थी, कि "उम्मीद मुर्दों के बीच भी, एक जिन्दा शब्द है"...!
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कश्यप किशोर मिश्र
बरसो से हर नया साल बेहतर होगा की उम्मीद से शुरू करते है और साल के अंत का लेखा-जोखा कही से पुराने बीत चुके सालों से कुछ अलग नहीं होता, तब भी न सिर्फ अपने लिए, बल्कि दुसरे लोगो को भी दिलासा देते हम उम्मीद जरूर जताते है, आने वाला साल अच्छा होगा |
पर बड़े लोग, उस बिरहमन को ढूंढे फिरे है, जिसने कह रखा है "ये साल अच्छा है" गोकि चचा ग़ालिब ने लिख तो दिया इक बिरहमन, पर ये तो लिखा नहीं कि वो बिरहमन है, कौन जिसने कह दिया कि "ये साल अच्छा है"
तो भाई लोग, ऊ बिरहमन हमी रहे, और हम कि कश्यप किशोर मिश्र वल्द चंद्रमौली मिश्र, साकिन मौजा परसिया, तप्पा-खुटहन, परगना-धुरियापार, तहसील गोला, ज़िला-गोरखपुर पुरे होशो हवास में यह सनद करता हूँ कि मेरे अलावे इस दावे कि "ये साल अच्छा है" किसी और बिरहमन की जुबान, ख्याल और कलम का कोई हाथ या साथ बिलकुल नहीं है |
इस दावे की वजह भी बड़ी मामूल है, और वो यूँ, कि जब हम निरे बच्चे रहे, और अपने गावँ से अपने छावनी (ग्राम-कोरड, तप्पा-सेमर, परगना-चिल्लूपार, तहसील-गोला, ज़िला-गोरखपुर) की जानिब अपनी दादी, जिनके लिए "पोथी पीढ़ा और अक्षर कीड़ा" हुआ करता रहा, के साथ जाते रहे, तो जब हमारे छोटे छोटे कदम ठक जाते थे, तो दादी कहती, बस उस अगले गावँ तक...| उसके आगे अपनी छावनी है और ऐसा कहते कहते वो हम कि एक छोटे से बच्चे को कई कोस चला ले जाती |
तो भाई लोगो, अपने बचपने में, अपनी अनपढ़ दादी से हमने सीखा, उम्मीद बड़ी ताकतवर शै है | यह हमने किसी पोथी-पत्रा से नहीं सीखा | लिहाजा जब आप "एक बिरहमन ने कहा है, कि ये साल अच्छा है" सुनकर उसके बिरहमन को ढूढने चले तो दोष उसकी उस पढाई को मत दीजियेगा, जो उसने अपनी पोथियो से सीखी, यह बात उस बिरहमन यानी कि हम ने अपनी अनपढ़ दादी से, अपने बचपने में सीखी थी, कि "उम्मीद मुर्दों के बीच भी, एक जिन्दा शब्द है"...!
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कश्यप किशोर मिश्र
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