शब्द-निःशब्द
क़िताबे उतर रही हैं, धीरे...धीरे !
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आदमियत की आख़िरी क़िताब
ओ कलकत्ता ! अर्थात अच्छे दिनों का कलकत्ता
Tuesday, February 18, 2014
जो है !
ग़म को ग़म मानो ;- जिंदगी सचमुच खूबसूरत है, पर उस ख़ूबसूरती की खाद-पानी हमारी मुहताज है;- और सुख को सुख मानो !
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कश्यप किशोर मिश्र
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