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क़िताबे उतर रही हैं, धीरे...धीरे !

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Tuesday, February 18, 2014

जो है !

ग़म को ग़म मानो ;- जिंदगी सचमुच खूबसूरत है, पर उस ख़ूबसूरती की खाद-पानी हमारी मुहताज है;- और सुख को सुख मानो !

_____________
कश्यप किशोर मिश्र 
Posted by Unknown at 4:34 AM
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Labels: आदमियत की आख़िरी क़िताब

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