...और फिर भेड़िये ने मेमने से कहा “मै तुम्हे खा जाऊंगा !”
मेमने ने स्मित मुस्कराहट के साथ भेड़िये को देखा और उसकी मुस्कराहट वक्र होते-होते क्रूर हो गई | थोड़ी देर पहले विस्फरित दीख रहे मेमने के नेत्रों में समुन्द्र सा ठहराव नजर आया और थर-थर कांपता मेमना शांत स्थिर और एकदम सहज होकर भेड़िये के सामने खड़ा उसे घूरते हुए बोला “घामड़ पशु ! तू क्या किसी अखबार का संपादक है ? या किसी समाचार चैनल का प्रमुख? अगर है भी तो अपनी कीमत बता, मुझे तुझ जैसे भेड़िये की खाल वालों की बड़ी ज़रूरत है”
भेड़िया एक कदम पीछे हट गया...
मेमना सहज गुरु-गंभीर आवाज में बोला “अगर तू कोई राजनितिक है, धनपशु है, तो बता, मै देखूं तेरा क्या इस्तेमाल हो सकता है? नौकरशाह, कारोबारी, दलाल क्या है तू ?” “डर मत तेरी पहचान बस मुझतक रहेगी, बाता क्या है, तू”
भेड़िया अब सचमुच डर गया, उसने अपने धड़कते कलेजे को काबू में किया और अपनी गुर्राहट को और धारदार निकालने की कोशिश करते हुए, यह जताने की कोशिश की, कि वाकई वो खूंखार भेड़िया ही है, और कहा “मुर्ख मेमने, मै तुझे बताकर तेरी मौत देना चाहता था, पर तू एक दम जाहिल निकला, रे मूर्ख मेमने, भेड़िया का मतलब मेमने की मौत होता है, मौत-जो तेरे सामने खड़ी है”
मेमना ठठा कर हँसा और उसने कहा “घामड़ जानवर, तू तो निरा जंगली जानवर निकला, ये तेरे जंगल का काईदा है, कि जो शेर है, वह शेर है जो लोमड़ी है, वह लोमड़ी ! यह आदमियों की बस्ती है, बच्चे ! इसे शहर कहते है | यहाँ जो शेर दिखता है, वो गीदड़ होता है और जो मेरे जैसा मेमना दिखे, वो तेरे जैसे भोले मूर्खों को फांसने का फंदा होता है”
ऐसा कह मेमने ने अपनी खाल उतार फेंकी, सामने बबर-शेर था! भेड़िये की हवा सरक गई, वह एकदम अपनी गुद्दी से तीन सौ साथ डिग्री घूमा और भाग चला | इधर मेमना अब शेर की खाल उतार रहा था |
_______________कश्यप किशोर मिश्र
4 comments:
सत्य से शाक्षात्कार
बहुत ही जानदार और प्रासंगिक...
वाह...शानदार!
बस डिग्री को एक सौ अस्सी कर दीजिये...तीन सौ साठ घूमकर वो फिर उसी स्थिति में पहुँच जायेगा |
बाप रे, क्या लिखते हैं रे बाबा !!!
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