Sunday, June 29, 2014

लेनिन का ओवरकोट

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...जार और उसके परिवार को मार डाला गया, औरतों-बच्चों समेंत । रूस की मेहनतकश सर्वहारा लड़ाको का कब्जा वोल्गा के इसपार हो चुका था ।
रूस का सभ्रांत वर्ग आदतन ओवरकोट पहनता था, सामनें खूँटी पर जार का ओवरकोट टँगा था, जिसे वह कभी-कभी पहन लिया करता था, लेनिन ने उस ओवरकोच को पहन लिया और सर्वहारा का झंडा फहरानें लगा ।
लेनिन का यह ओवरकोट, बाद में स्टालिन के हाथ लग गया और उसनें उसे ओढ़ लिया ।
...उस ओवरकोट के भीतर वह पूरी तरह नंगा हुआ करता था, ट्राटस्की की नजर उस ओवरकोट पर थी ।
 नंगा क्या नहीं करता ? ट्राटस्की की नियति ही मौत थी, उसनें ओवरकोट पर नजर डाली थी । ओवरकोट, जो लेनिन का था, जिसे जार के वंश के लोग पहनते थे ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Friday, June 27, 2014

लाचार

...आखिरकार उसका शरीर पस्त हो गया । थक कर निढ़ाल हो चले शरीर से खड़े रहना भी कठिन हो रहा था |

अभी खूब सारे लोग बचे हुए थे, और वह अकेला जल्लाद !

बेचारा ! थक कर बैठ गया !

... लाचार !

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कश्यप किशोर मिश्र

Thursday, June 26, 2014

निषेध

युवक नया-नया शहर में आया था, यूँ ही टहलते टहलते वह एक संस्थान के भीतर टहलने लगा, सुबह का वक्त था, संस्थान के भीतर खूब सारे लोग टहल रहे थे, टहलते टहलते आदतन उसने एक सिगरेट सुलगा ली, सामने से एक बुजुर्ग सज्जन आते दिखे, उन्हें देख कर लोग अदब से राह से हट जा रहे थे, जिससे युवक ने अनुमान लगाया वह संभवतः संस्थान में किसी प्रतिष्ठापूर्ण पद पर होंगे|
बुजुर्ग सज्जन जब करीब आ गए तो शालीनता वश युवक ने सिगरेट पीछे कर लिया| बुजुर्ग युवक के करीब आए और सहज मुस्कराहट से उन्होंने पूछा आप शायद यहाँ नए है? युवक ने शालीनता से जबाब दिया जी, पहली बार आया हूँ ! तो बुजुर्ग ने कहाँ हाँ ! तभी आपको नहीं पता, यहाँ धुम्रपान निषेध है और एक बार पुनः युवक पर सहज वात्सल्यपूर्ण मुस्कराहट डालकर आगे बढ़ गए |
युवक मुदित-चकित भाव से बुजुर्ग को देखता रहा, निषेध है बस बता कर बुजुर्ग आगे बढ़ गए, यह बता देना कितना सहज था, अबतक उसने यही देखा था कि मनाही के साथ-साथ मना करने वाला अपना रौब भी दिखाता था, कभी-कभी यह भी होता था कि मनाही करने वाला मोहलत भी देने लगता खैर, पहली बार है,पी लीजिये पर आइन्दा याद रखियेगा कि यहाँ मनाही है कुल मिला कर मनाही करने वाला उस मनाही के बहाने ख़ुद के होने की स्थापना करता था, जबकि यह बुजुर्ग जो है, बस वह बाता कर आगे बढ़ गए |
अगली सुबह युवक टहलने निकला तो उसके पाँव पुनः उसी तरफ बढ़ चले, टहलते-टहलते अनायास ही अवचेतन में ही पल रही आदत के वश उसने सिगरेट सुलगा ली और इसका ध्यान तब आया जब बुजुर्ग सामने ही दिख गए, युवक की दशा मानो काटो तो खून नहीं वाली थी, बुजुर्ग ने युवक को देखा, एक परिचित मुस्कराहट डाली और कहा आपको दुबारा देख कर अच्छा लगा, यहाँ धुम्रपान निषेध है और आगे बढ़ गए |
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कश्यप किशोर मिश्र      

Wednesday, June 25, 2014

पालिटिक्स

हत्या बस हत्या होती है ।
हत्यारा सिर्फ और सिर्फ हत्यारा होता है ।
हथियार कुछ भी हो सकता है, धार्मिकता, नास्तिकता, शून्यवाद, अस्तित्ववाद, जनसेवा, क्रांति, मानवाधिकार, सेना, कुछ भी ।
यह तो हत्यारे पर है, वह हथियार क्या बनाता है, एक हत्यारा जिस नली से किसी मरणासन्न को जीवनदायिनी आक्सीजन दी जा रही है, उसका इस्तेमाल उस रोगी की हत्या में कर लेता है । वह नली हत्यारा नहीं होती ।
...तो हमें ये पैतरें पता है ।
हथियार को हत्यारा बताने के पीछे तुम्हारी मंशा क्या है, दोस्त ?
एक सवाल पूछे? 
"तुम्हारी पालिटिक्स क्या है, दोस्त?"
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, June 21, 2014

बच्चे का रोना

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...सारी नफरत निकल चुकी थी, हिंसा के विभत्स ताडंव से बस्ती सारी रात के दौरान कई बार गुजरी और हिंसक हमलावरों ने बर्बर होकर, चुन चुन कर एक एक आदमी का, जो भी मिले उनका कत्ल कर डाला ।

सुबह की उजास के साथ हमलावर अपने रक्तरंजित हथियार पोछते लौटनें लगे, कि तभी एक झोपड़ी से एक बच्चे के रोनें की आवाज आई, बच्चा जग कर दूध के लिए अपनीं माँ को ढ़ूढ़ रहा था, लौटते हुए हमलावरों के कदम रूक गए । वो पलट कर वापस देखनें लगे । झोपड़ी के दरवाजे से रोते हुए, दूध और अपनी माँ को तलाशता एक दो साल का बच्चा बाहर आया, हमलावरों के नेता और रोते बच्चे की निगाहें आपस में मिली । हमलावरों के नेता के पैर लरज गए ।

...इस बात को आज साठ बरस गुजर चुके हैं, अपनें उम्र के चौथेपन में चल रहे, हमलावरों के नेता के पैर अपनें नाती पोतों के रोनें की आवाज से लरज जातें है, वह धम्म से जमीन पर गिर पड़ता है ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Thursday, June 19, 2014

शहर में अब भेड़िये नहीं आते

...और फिर भेड़िये ने मेमने से कहा “मै तुम्हे खा जाऊंगा !”
मेमने ने स्मित मुस्कराहट के साथ भेड़िये को देखा और उसकी मुस्कराहट वक्र होते-होते क्रूर हो गई | थोड़ी देर पहले विस्फरित दीख रहे मेमने के नेत्रों में समुन्द्र सा ठहराव नजर आया और थर-थर कांपता मेमना शांत स्थिर और एकदम सहज होकर भेड़िये के सामने खड़ा उसे घूरते हुए बोला “घामड़ पशु ! तू क्या किसी अखबार का संपादक है ? या किसी समाचार चैनल का प्रमुख? अगर है भी तो अपनी कीमत बता, मुझे तुझ जैसे भेड़िये की खाल वालों की बड़ी ज़रूरत है”
भेड़िया एक कदम पीछे हट गया...
मेमना सहज गुरु-गंभीर आवाज में बोला “अगर तू कोई राजनितिक है, धनपशु है, तो बता, मै देखूं तेरा क्या इस्तेमाल हो सकता है? नौकरशाह, कारोबारी, दलाल क्या है तू ?” “डर मत तेरी पहचान बस मुझतक रहेगी, बाता क्या है, तू”
भेड़िया अब सचमुच डर गया, उसने अपने धड़कते कलेजे को काबू में किया और अपनी गुर्राहट को और धारदार निकालने की कोशिश करते हुए, यह जताने की कोशिश की, कि वाकई वो खूंखार भेड़िया ही है, और कहा “मुर्ख मेमने, मै तुझे बताकर तेरी मौत देना चाहता था, पर तू एक दम जाहिल निकला, रे मूर्ख मेमने, भेड़िया का मतलब मेमने की मौत होता है, मौत-जो तेरे सामने खड़ी है”
मेमना ठठा कर हँसा और उसने कहा “घामड़ जानवर, तू तो निरा जंगली जानवर निकला, ये तेरे जंगल का काईदा है, कि जो शेर है, वह शेर है जो लोमड़ी है, वह लोमड़ी ! यह आदमियों की बस्ती है, बच्चे ! इसे शहर कहते है | यहाँ जो शेर दिखता है, वो गीदड़ होता है और जो मेरे जैसा मेमना दिखे, वो तेरे जैसे भोले मूर्खों को फांसने का फंदा होता है”
ऐसा कह मेमने ने अपनी खाल उतार फेंकी, सामने बबर-शेर था! भेड़िये की हवा सरक गई, वह एकदम अपनी गुद्दी से तीन सौ साथ डिग्री घूमा और भाग चला | इधर मेमना अब शेर की खाल उतार रहा था |
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कश्यप किशोर मिश्र

Tuesday, June 17, 2014

जानकारी से भी अज्ञान उपजता है

जो तुम देख रहे हो, वह वही है, इस बात का क्या भरोसा ? हो सकता है वह कुछ और हो और तुम्हे बताया कुछ और गया हो, इसे प्रमाणित कौन करेगा कि जो तुम्हे बताया गया है, जो तुम जानते हो वह पूर्ण सत्य है | तुम्हे सांप खतरनाक दिखता है, उसमे विषदंत होते है| यह तुम्हारी जानकारी है, कि सांप एक बहुत ही खतरनाक प्राणी है और यह डंस ले तो आदमी मर जाता है, लिहाजा तुम सांप देखते हो और उसे मार देते हो |

तुम्हारी स्थापनाए कितनी झूठी है, यह कौन तय करेगा ? क्योकि तुमने जिन जानकारियों से अपने पूर्वाग्रह तय कर लिए है, वे जानकारिया भी झूठी हो सकती है | जिस विष की वजह से तुम सांप को खतरनाक मानते हो, वह विष, अस्सी प्रतिशत से भी जादा साँपों में होता ही नहीं और साँप के काटने से मरने वाले लोगो का एक बड़ा हिस्सा सांप के ज़हर से न मर कर भय से मरता है |

जादा खतरनाक कौन है, विष या भय ? चलो मान लेते है दुनिया में कुछ सांप विषैले हैं और उसकी वजह से वे सांप खतरनाक है, उन विषैले साँपों की वजह से कुछ व्यक्तियों की मौत भी होती है, पर उस भय का क्या ? जिस भय की वजह से आदमी सदमे में आकर मर जाता है, यह भय तो आदमी के भीतर है | यह भय सांप के विष से भी जादा खतरनाक है, जो तुम्हारे भीतर है | तो तुम्हारे लिए जादा ख़तरनाक क्या हुआ, सांप का विष या तुम्हारे भीतर समाया भय|

अगर सांप अपने विष की वजह से खतरनाक है, तो उससे जादा खतरनाक भय जो तुमने अपने भीतर पाल-पोस रखा है, उसकी वजह से तुम भी तो खतरनाक हो, सांप से भी जादा खतरनाक और इस खतरनाक का ख़तरा ख़ुद तुम्हे है, तो तुम ख़ुद ही, ख़ुद के लिए सांप से भी जादा खतरनाक हो| सांप को तो तुम मार दोगे, ख़ुद का क्या करोगे | हाँ, अगर भय को मार सको तो न तुम अपने भय से ख़ुद मरोगे न सांप को मारोगे|

तो जो तुमने जान लिया, वह जरूरी नहीं कि सत्य हो, ज़रूरी नहीं कि पूर्ण हो, जिस दिन तुम अपनी जानकारी के आधार पर कोई स्थापना बना लेते हो, किसी पूर्वाग्रह को जन्म दे देते हो, तुम अपनी सृजनात्मकता खत्म कर देते हो, यह पूर्वाग्रह ही रुढी है |

रूढ़ हो जाना ठहर जाना, अपने मष्तिष्क को बंद कर देना, हमारे भीतर की कोमलता को, हमारी विचारशीलता को नष्ट कर देता है | जब मनुष्य रूढ़ हो जाता है, वो हत्यारा बन जाता है, जब समाज रूढ़ हो जाता है, वह बर्बर आतताई और हिंसक हो जाता है| यह परिवर्तन उन्हें ख़ुद नहीं दिखता, क्योकि अपने कृत्य को वो अपने रूढ़ तर्कों से वैलिडेट करने की कोशिश करते है| ठीक वैसे ही, जैसे कुछ थोड़े से विषैले साँपों की वजह से सारे सांपो को विषैला मान उनकी जान ले लेने को आत्मरक्षा के नाम पर हम मनुष्य वैलिडेट करते रहे है, जबकि असल हत्यारे हम ख़ुद है |

पता नहीं दुनिया में सालाना सौ आदमी भी सांप के विष से मरते भी होंगे या नहीं, पर साल डर साल लांखो सांप हम बस अपने भय की वजह से मार डालते है | इसकी वजह हमारे विचारों का रूढ़ हो जाना है, हमने मान लिया यह पृथ्वी बस हमारी है, हमें बचपन से यह अहसास कराया जाता है कि यह पृथ्वी निरापद होनी चाहिए, इस निरापद पृथ्वी के क्या मायने है, यही न कि यहाँ सब कुछ हमारे हिसाब से हो, तो सब कुछ हमारे हिसाब से होने के लिए हम अपने घर को “कीट नियंत्रित” कर देते है | बस एक पल में पृथ्वी पर हमारे घर का एक छोटा सा हिस्सा ही लांखो कीट-पतंगों के लिए निरापद नहीं रह जाता | लाखो किट-पतंगों को आपदा में डालकर, उनकी हत्या कर हम अपने घर को निरापद कहते है | तो जिस घर को हम निरापद घर कहते है, मानते है, वह निरापद हमारे लिए है, हमारी उस जानकारी की सीमा के भीतर निरापद है जितना हम जानते है, वरना इस पृथ्वी के लाखों प्राणियों के लिए वह आपद-घर है|

कीट-पतंगों के लिए उस आपद-घर को निरापद मान, हम उसके बगीचे के फ़ूलों पे मंडराती तितलियाँ ढूंढते है !
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कश्यप किशोर मिश्र 

Monday, June 16, 2014

खुदाई संदेशा

जो शांत चित्त है,
उनसे बहुत से लोग अशांत होंगे ।
जो अहिंसा की बात करेगें,
उनकी हत्या कर दी जाएगी ।
जो मिल-जुल कर रहनें की बात करेगें,
उन्हें अलग-थलग कर दिया जायेगा ।
जिन आँखों में हया होगी,
वो उठनें नहीं पाएगी।
दीन-ईमान की कीमत वो रखेंगे,
जो उसे चंद सिक्को से तौल सकें ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, June 14, 2014

शुरुआत

बोलो ""
अ से अलिफ़ |
अब लिखो ...
"अ"
"अलिफ़ " वाला अ |
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कश्यप किशोर मिश्र 

फ़र्क

ऊँट और गधे में बस एक फ़र्क होता है |
ऊँट गधा नहीं होता : गधा ऊँट नहीं होता |

...बाकी कोई फ़र्क नहीं होता |
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कश्यप किशोर मिश्र

सच का झूठ

जो झूठा है; संभव है उसके पास अपने सच का प्रमाण न हो |
जो सच्चा है; संभव है हमारे पास उसके झूठे होने का प्रमाण न हो |
...बस एक जानकारी स्थिति एकदम उलट देती है | यह जानकारी तीन मिनट में भी सामने आ सकती है और सामने आने में तीन हज़ार साल भी लग सकते है |
संभव है, यह जानकारी मानव-जाति के सामने कभी न आए |
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कश्यप किशोर मिश्र



Monday, June 9, 2014

सवाल :- जीवन क्या है ?

जबाब :- अपने होनें को निरंतर विस्तार देते रहने की प्रक्रिया, जीवन है |

नोट :
*मौत जीवन का एक महत्वपूर्ण ठहराव है, पर किसीके होनें (पहचान) का अंत नहीं है |
*मौत कई बार पहचान के उत्प्रेक यानी कैटलिस्ट एजेंट का कम करती है|
*बाज दफ़ा, मौत पहचान बदल देने का भी कम करती है |
*आज-हम का "अहम्" एक रोग है, बस |
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कश्यप किशोर मिश्र


Saturday, June 7, 2014

...तो हम ख़ुदा को बर्खास्त करते है

अगर कोई मज़हब किसी मजलूम के क़त्ल की इजाज़त देता है, तो ऐसे मजहब में सर जिसकी इबादत में सजदे करते है, वह एक शैतान ही हो सकता है, खुदा नहीं|
किसी मजलूम के क़त्ल की बुनियाद कोई भी हो, काम यह मुसलसल बे-ईमानी है, ये लोग खुदा के बन्दे नहीं हो सकते, ये नाहक ख़ुद को मुसलमान कहते है | जो वाकई मुसलमान हैं, वो मजहब के नाम पर किसी मजलूम का क़त्ल जैसी घटिया और शैतानी इबादत सी हरकते नहीं करते |

एक आदमी की जान से जादा कीमती मज़हब नहीं होता, ऐसी हरकते हमारे मजहब को बजबजाता नाबदान बना देती है | फ़साद करते हुए क़त्ल ओ गारत करना खुदाई मजहब नहीं है |

अगर वाकई खुदा ऐसे किसी क़त्ल की इजाज़त देता है, तो क़यामत के वक़्त इन हत्यारों और इनके खुदा का फ़ैसला, हमारे जैसे अमन पसंद लोग करेगे |
...और तबतक के लिए, ऐसे खुदा को हम बर्खास्त करते है|

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कश्यप किशोर मिश्र