Saturday, February 22, 2014

गेहूं और बथुआ

हर कथन के तीन पक्ष होते है, अपना पक्ष, दूसरे का पक्ष और सच का पक्ष | तीसरा पक्ष सबसे अहम् होता है, पर सबसे जादा अनदेखा किया जाने वाला पक्ष यही होता है |

खेत जोटा जाता है, गेहूं के लिए, खाद-पानी-बीज गेहूं का होता है, पर उग आता है, बथुआ भी| खेत में दो पक्ष बन जाते है | गेहूं के और बथुआ के | बथुआ एक एक पोरसा लम्बा हो जाता है | इतना तेज बढ़ता है, कि रोका न जाए तो गेहूं को दाब दे | गेहूं की ज़मीन-खाद-पानी सब पे कब्ज़ा कर लेता है |

गेहूं यह देखता है और देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उधर बथुआ हरियाला होता जाता है | दुनिया गेहूं-बथुआ के इस खेल को अपनी नज़र से देखती है और पीड़क-पीड़ीत को अपने हिसाब से परिभाषित करती है|

एक दिन किसान आता है, सोहनी के लिए, वह बथुआ खोट लेता है | गेहूं की रोटी के साथ बथुआ का साग खाता है |

खेत-खाद-पानी-बीज सब किसान की मेहनत का नतीजा है | वह सोहनी के दौरान बथुआ खूंटता है और कटाई के वक्त गेहूं काटता है |

...बस खूटने और काटने का समय अलग-अलग होता है |

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कश्यप किशोर मिश्र


Thursday, February 20, 2014

मेरी दादी

बच्चे आपस में बात कर रहे थे

पहला बच्चा - मेरी दादी की कहानियो में एक राजा होता था, उसकी सात रानियाँ होती थी, छोटी रानी सबसे खूबसूरत होती थी, वह राजा की सबसे चहेती होती थी |

दूसरा बच्चा - मेरी दादी की कहानियो में एक चिड़ा होता था, एक चिड़िया होती थी, उनके दो बच्चे होते थे |

तीसरा बच्चा - मेरी दादी बस एक कहानी थी !

बाकी दोनों बच्चे- हाँ, हाँ हमारी दादी भी बस एक कहानी ही थी | 

Wednesday, February 19, 2014

औरत क्या बस औरत नहीं हो सकती ?

औरतो को सामान मान लिया जाता है, जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल करो, इस बात की जड़े इतनी गहरी है कि जबकि दोनों वाक्यों का मतलब वही होगा, पर अपने अवचेतन में हमेशा हम वाक्य संख्या 1) का इस्तेमाल ही करते है | "हमारी औरते" या "अपनी औरते" |

1) अगर तुम जानना चाहते हो कोई समाज कितना सभ्य है, तो यह देखो वह अपनी औरतों से कैसे पेश आता है | 

2)अगर तुम जानना चाहते हो कोई समाज कितना सभ्य है, तो यह देखो वह औरतों से कैसे पेश आता है | 

औरते क्या बस "औरते" नहीं हो सकती |
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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 18, 2014

जो है !

ग़म को ग़म मानो ;- जिंदगी सचमुच खूबसूरत है, पर उस ख़ूबसूरती की खाद-पानी हमारी मुहताज है;- और सुख को सुख मानो !

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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 11, 2014

होते होते रह गई क्रांतियाँ


मन क्रांतिकारी -क्रन्तिकारी हो रहा हो, तो चाय लाजिम है |
अक्सर क्रन्तिकारी मन को समय पे मिल गई कड़क चाय ने क्रांति में उबाल लाने का काम किया है |
कड़क चाय और पटियाला पैग का क्रांति में अमिट योगदान रहा है |
न जाने कई क्रांतिकारी बहस, चाय के आने तक मुल्तवी रही |

ऐसा भी हुआ, चाय नहीं मिल पाई और क्रांति होते होते रह गई |
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कश्यप किशोर मिश्र 

Saturday, February 8, 2014

सबका बराबर हक़

आदमियों के बीच बहस जारी थी, जो बाद में अदावत में बदल गई कि आदमियों में जो ऊँची जातियाँ है उनके मुकाबले तो दलित जातियां है, उनको उनका हक़ मिलना ही चाहिए| जिन लोगों के कब्जे में, संसाधन थे वे उनसे अपना नियंत्रण हटाने में मुश्किल महसूस कर रहे थे और जो दलित थे, उन्हें सदियों से अपने दबे-कुचले होने का प्रतिकर भी चाहिए था और अपना हक़ भी| यह बात कही से गलत भी नहीं थी| "आखिर सबको अपना हक़ चाहिए ही" |

इस बात को लेकर आदमियों के बीच ख़ूब हंगामा बरपा हुआ था | सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हर मुद्दे "सबको उसका हक़" की बात कर रहे थे |

बात जंगल तक पहुंची | समन्दरो तक पहुची | पहाड़ो की चोटियों तक पहुंची|

बात थी "सबको उसका हक़" तो वे जंगलात जो तामीरी लकडियो के लिए काटे जाते थे, सवाल करने लगे "क्या उनका इस पृथ्वी पर फलने-फूलने का हक़ नहीं" उन्हें लगातार काट-काट कर ख़तम क्यों किया जा रहा है|

जानवर जो जंगलों की हद तक सिमटे हुए थे सवाल करने लगे "ये जमीन, ये जंगल क्या हमारे भी नहीं ?" क्या हमें यह हक़ नहीं की आदमियों की तरह हम भी तय करे, हमारी क्या ज़रूरत है, क्या यह पृथ्वी अकेले आदमियों की है?"

परिंदे अपने लिए आकाश मागने लगे और मछलियाँ अपने लिए साफ़ नदी तालाब और समंदर |

सबने जानवरों को अपना सन्देशा "लुटेरे-आदमियों" तक पहुचाने को कहा और जंगल के जानवर अपनी और अपनों की बात लेकर एक गुट में अपने हक़ की बात करने बस्तियों की तरफ बढ़े |

बस्तियों में हंगामा बरपा था, तमाम जंगली जानवर बस्तियों की जानिब आ रहे है और नारे लगा रहे है "यह पृथ्वी हमारी भी है" आदमियों ने अपनी सारी अदावत भुला दी और एकजुट हो गए| उन्होंने जानवरों को खदेड़ लिया| कुछ जानवर मारे गए, कुछ घायल हुए कुछ पहले ही भाग खड़े होने की वजह से साफ़ बच गए | बहरहाल आदमियों का ख़तरा टल गया |

आदमियों ने पहला काम किया, बस्तियों के करीब जो जंगल थे, उन्हें खूब दूर तक काट डाला और बस्तियों को अपने लिए निरापद बना लिया |

...अब आदमी आपस में "सबको अपना हक़ चाहिए" के मसले पर गंभीर है | 


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कश्यप किशोर मिश्र 

Friday, February 7, 2014

फ़ैसला

जीवन में, कई बार और बहुधा बार -बार, हम फैसला पहले ले लेते है | 
गवाहियों और सबूतों को, उस फ़ैसले के मुताबिक सजा देते है |
अपने फ़ैसले की खिलाफत करती गवाहिया और सबूत हमें झूठ जान पड़ते है |

झूठें हम होते है पर यह असल फैसला हम कभी नहीं लेते !

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कश्यप किशोर मिश्र 

Wednesday, February 5, 2014

हजरत गब्बर और उनका दल-बल

गब्बर= ओ रे कालिया तेरी बीबी अब भी तुझको पीटती है, का रे ?
कालिया= सरदार! हमरे बीच मार-कुटाई तो कभी नहीं होती थी !
गब्बर = चोप्प हरामखोर! जबाब हां या ना में दो |

(तभी बीच में बसंती आ जाती है)
बसंती= यूँ है, कि सरदार इसका मतलब यह हुआ कि हाँ बुलवाकर या ना बुलवाकर किसी भी तरह से तुम कालिया की बीबी को झगडालू दिखाना चाहते हो ! ये तो सरासर गलत बात है, गब्बर!

(दृष्य बदलता है और गब्बर गाववालो के बीच में है, कालिया और बसंती रस्सियों से बंधे हुए है)
गब्बर= सुनो -सुनो गावँ वालों, ई जो बसंती है न उसका कालिया से प्रेम चल रहा है, ई तो कालिया की बीबी से सरासर नाइंसाफी है |

(कालिया की बीबी दौड़ती आती है)
कालिया की बीबी= नहीं सरदार ! यह बात सरासर झूठ है |
गब्बर (चीखते हुए) - सूअर के बच्चो, सब के सब मिले हुए है, सब के सब अपराधी है |

गब्बर ने बन्दूक निकाली और गोलिया दाग दी | धाय-धाय -धाय ! कालिया, उसकी पत्नी और बसंती मारे जाते है |
गब्बर (स्वगत)- अरे, यह बन्दूक चलती भी है!
शान्भा- सरदार की जय हो ! सरदार ने गावँ को भ्रष्टाचारियो की अराजकता से मुक्त कर दिया |

(गावँ वाले नारे लगाते है "हजरत गब्बर की जय हो, हजरत गब्बर की जय हो"
नेपथ्य में गब्बर के गुण्डे उन लोगो की पिटाई कर रहे है, जो सच्ची बात कहना चाहते है|)


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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, February 4, 2014

क्रांति के विरोधी

किरान्तिकारी को बड़ा क्रोध हो रहा था, धूप की चटक उसकी खोपड़ी को गरम किये दे रही थी | उसने जोर जोर से नारे लगाये "किरांती जिंदाबाद" "किरांती जिंदाबाद" उसने इधर उधर देखा, ऊपर नीचे देखा, आगे पीछे देखा |कही किरांती होती नज़र नहीं आई | 

किरान्तिकारी ने तय किया अब वक़्त मरने-मारने का आ चुका है और अब उसे ही कुछ करना होगा |
उसने पिस्तौल निकाली और किरांती- किरांती चिल्लाता दौड़ पड़ा | सामने जुता खेत था | किरान्तिकारी ने जबसे दिमाग सम्हाला था, बस किरांती की थी| खेत खलिहान से उसका कोई सम्बन्ध रहा ही नहीं था| जुते खेत में वह दौड़ नहीं पाया और गिर पड़ा |

उसे गिरते देख, हल चला रहे किसान हँस पड़े | किरान्तिकारी उठा उसने अपनी पिस्तौल सम्हाली और किसानो पर पिस्तौल दाग दी | धायं! धाय! की आवाज के साथ हँसते किसान निष्प्राण हो गए |

किरान्तिकारी ने पिस्तौल से उठते धुंवे के बीच नली में एक फूंक मारी और बड़ी ही वितृष्णा से किसानो को देखते हुए सोचा "क्रांति के विरोधी " और बड़े संतोष से आगे बढ़ गया |

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कश्यप किशोर मिश्र 

Monday, February 3, 2014

हत्यारों के भेद

दुनिया में "हत्यारे" दो तरह के है ;-
पहले;- जो बेहद ईमानदार है और विचारधारा (वो कैसी भी और कोई भी हो) से जुडी हत्याए करते है 
दूसरे ;- कम्जर्फ़ है और विचारहीन हत्याए करते है |

जबकि "हत" बस एक तरह के होते है, जो दोनों तरह के हत्यारों द्वारा मारे जाते है !
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कश्यप किशोर मिश्र