Sunday, May 25, 2014

ओ कलकत्ता ! अर्थात अच्छे दिनों का कलकत्ता...(4)

रामप्रसाद को पार्टी पर्चों की बात समझ नहीं आती, उसके और उसके साथियों के मन में यह सवाल बार-बार उठता अब तो हिन्दुस्तान आजाद है, अब ये लाल झंडा वाले किराँति-किराँति क्यों चिल्लाते रहते है ?
लाल झंडा वालों नें उन्हें समझाया "सारा क्रांतिकारी लोग गोली-बंदूक खा के देश को स्वतंत्र किया, गरीब लोग के लिए, मगर अमीर लोग के लिए गाँधी-नेहरू मिल के गरीब-मजदूर से धोखा किया और स्वतंत्र देश को गणतंत्र कर दिया । हम क्रांति करेंगे और गरीब-मजदूर के लिए देश को फिर से स्वतंत्र करेंगे।"

बात सबके समझ में आ गई ।
कलकत्ता के अच्छे दिनों में गोएबल्स भी शर्मा जाता था ।
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कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, May 24, 2014

कामरेड का मतलब

पूरब से आए मजदूरों से, मुख्यतः, आबाद मुहल्ले के चौक पर पार्टी आफिस था, बगल में एक चाय दुकान थी, जिसके चुल्हे पर लिकर चाय सुबह छः से रात एक बजे तक खौलती रहती थी, पार्टी आफिस गर्मी की लम्बी दुपहरी और रात के दौरान युवा लड़कों का कैरम क्लब भी हुआ करता था, यही वजह थी कि किसी ने पार्टी आफिस के बोर्ड के नीचे लिख रखा था "रेडलाइन कैरम कल्ब" ।
बच्चा तब चौथी में पढ़ता था, गर्मियों में टैगोर निकेतन से निकलता तो सीधे घर न जाकर दोपहर पार्टी आफिस में गुजारता, जहाँ उसनें कड़कती धूप की काट में चाय पीना सीख लिया और बढ़ते बढ़ते इस आदत ने बच्चे को थिइक बना दिया, इन दुपहरियों में बच्चे नें शोलोखोव की इंसान का नसीबा से शुरू किया और गोर्की की माँ से होते, तुर्गनेव, टालस्टाय और यहाँ तक की पार्टी के प्रचार पर्चे तक पढ़ जाया करता ।
आफिस में एक होलटाइमर था "मधु" लोग कहते वह सुबह कुल्ला भी दारू से ही करता है, लड़कियों को अजीब निगाहों से देखा करता, दुनिया भर की औरतों से उसके संबंध थे ।
एक दोपहर बच्चे ने मधु को घेरा, बच्चे ने मधु से कहा आप कामरेड अंकल है और कितनी खराब जिंदगी जीते है ।
गरमी खूब थी और मधु ने पी रखी थी, वह बच्चे को कामरेड क्या होता है, उसका जीवन क्या होता है समझाने लगा, वह न जाने क्या क्या बोले जा रहा था, बच्चा कुछ समझ नहीं पाया, अंत में खीझ कर मधु ने कहा "बोका, तुमि किछू बूझे पारछी ना, ओरे बाबा ई कामरेड का जो काम होता है न, ओसका मतलब होता है "फेक्स"(बच्चे ने यही सुना समझा) नही सोमझे ? काम माने लोरकी और रेड माने दारू ।
बच्चे ने उसके बाद मधु से कभी बात नहीं की, दोपहर में किताबों के लिए अब वह रामकृष्ण मठ चला जाता ।
बच्चा अब बड़ा हो चुका है और कलकत्ता अब अच्छे दिनों वाला कलकत्ता भी नहीं रहा । पर कामरेड के अर्थ की बात चले चो उसे हमेशा कामरेड मधु याद आता है, जो पता नहीं कामरेड था या नहीं पर उसने कामरेड के अपने मानी बनाए थे ।

...अच्छे दिनों के कलकत्ता में ऐसा वह अकेला नहीं था ।
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कश्यप किशोर मिश्र 

Friday, May 23, 2014

लिखने का सलीका

हिटलर के बारे में गांधी;
त्याग की शक्ति तो हिंसक भी रख सकता है, हिटलर भी त्यागी कहा जाता है पर वह हिंसा की मूर्ति है, सुना जाता है वह निरामिषहारी है, मुझे यह मानने में दिक्कत है कि वह कैसे इतने कत्ल बर्दाश्त कर लेता है ।
कुछ भी हो, उसका जीवन त्याग से भरा बतलाया जाता है, वह निर्वयसनी है, उसने शादी नहीं की है, उसका आचरण साफ बतलाया जाता है, वह बहुत जागृत रहता है । पर हममें त्याग और अहिंसा दोनों चाहिए, अहिंसा का अर्थ है प्रेम ।
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पार्टी में समझया गया, इसे ऐसे लिखते है :
हिटलर के बारे में गांधी-
"उसमें कोई पाप नहीं है, उसने शादी नहीं की है, कहा जाता है, उसका चरित्र स्वच्छ है"।

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कश्यप किशोर मिश्र 

Wednesday, May 21, 2014

स्टालिन और हिटलर

स्टालिन और हिटलर एक दूसरे के पोषक थे, हिटलर ने रूस पर हमला नहीं किया होता तो स्टालिन को हिटलर से कोई मुश्किल नहीं थी ।
यह स्थिति तब थी, जब हिटलर जर्मनी में कम्युनिस्टों का कत्ल करवा रहा था ।
रूस और जर्मनी की जंग दो परस्पर विरोधी विचारधारा की जंग न होकर, दो साम्राज्यवादी राष्ट्रों की जंग थी ।
कम्युनिस्ट रूस ने फासिष्ट हिटलर का विरोध कभी नहीं किया बल्कि रूस ने जंग उस हिटलर के खिलाफ लड़ी, जिसने रूस पर हमला किया था ।

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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, May 20, 2014

मेरा वतन

इस मुल्क में एक शहर था कलकत्ता...
जिसके अच्छे दिनों का एक करीब तीस साला दौर चला |
यह शहर, हलाकि, था हिन्दुस्तान में ही,
पर वहाँ अच्छे दिन लाने वाले बाबू लोग 

अपनी अपनी आस्था के हिसाब से, 
चीन या रूस का नक्शा देखते ही कह उठते थे 
"ओह ! मेरा वतन"

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कश्यप किशोर मिश्र 

नजरिया

वीरान रेगिस्तान में दो दरवेश  बैठे बात कर रहे थे, दूर तक फैले वीराने को देखते, पहले दरवेश ने लम्बी साँस भरी और कहा, यहाँ सबकुछ कितना वीरान है, जीवन का नामोनिशान तक नहीं है|

दूसरा दरवेश जो बुजुर्ग था, उन पत्थरों को उलटने-पुलटने लगा, जिनपर वो बैठे थे, रात की ओस पत्थरों की तली में मौजूद थी, एक पत्थर तले एक अंकुरित बीज दिखा, बुजुर्ग दरवेश  ने उसे दिखा कर कहा देखो, यहाँ जीवन है|

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कश्यप किशोर मिश्र