Saturday, July 26, 2014

सहीफ़ो से छिटकी एक आयत

_____________________
गोश्त बस गोश्त होता है और जानवर बस जानवर ।
गोश्त चाहे सूअर का हो या गाय का, होता वह जानवर का गोश्त ही है।
पर जिबह की छूरी के चलनें की वजह अगर मजहबी नफरत हो तो गोश्त अपनी शक्ल भी बदल लेते है ।
लिहाजा नफरत की छूरी से जिबह गाय का गोश्त, सूअर का गोश्त बन जाता है और सूअर का गोश्त, गाय का गोश्त बन जाता है ।
(यह वह आयत है जो इंसान के गलीज मन को परख उतरी ही नहीं और सहीफों मे जा छुप बैठ गई ।)
_______________
कश्यप किशोर मिश्र
(आदमीयत की आखिरी किताब से)

Sunday, June 29, 2014

लेनिन का ओवरकोट

______________________
...जार और उसके परिवार को मार डाला गया, औरतों-बच्चों समेंत । रूस की मेहनतकश सर्वहारा लड़ाको का कब्जा वोल्गा के इसपार हो चुका था ।
रूस का सभ्रांत वर्ग आदतन ओवरकोट पहनता था, सामनें खूँटी पर जार का ओवरकोट टँगा था, जिसे वह कभी-कभी पहन लिया करता था, लेनिन ने उस ओवरकोच को पहन लिया और सर्वहारा का झंडा फहरानें लगा ।
लेनिन का यह ओवरकोट, बाद में स्टालिन के हाथ लग गया और उसनें उसे ओढ़ लिया ।
...उस ओवरकोट के भीतर वह पूरी तरह नंगा हुआ करता था, ट्राटस्की की नजर उस ओवरकोट पर थी ।
 नंगा क्या नहीं करता ? ट्राटस्की की नियति ही मौत थी, उसनें ओवरकोट पर नजर डाली थी । ओवरकोट, जो लेनिन का था, जिसे जार के वंश के लोग पहनते थे ।
_______________
कश्यप किशोर मिश्र

Friday, June 27, 2014

लाचार

...आखिरकार उसका शरीर पस्त हो गया । थक कर निढ़ाल हो चले शरीर से खड़े रहना भी कठिन हो रहा था |

अभी खूब सारे लोग बचे हुए थे, और वह अकेला जल्लाद !

बेचारा ! थक कर बैठ गया !

... लाचार !

_____________
कश्यप किशोर मिश्र

Thursday, June 26, 2014

निषेध

युवक नया-नया शहर में आया था, यूँ ही टहलते टहलते वह एक संस्थान के भीतर टहलने लगा, सुबह का वक्त था, संस्थान के भीतर खूब सारे लोग टहल रहे थे, टहलते टहलते आदतन उसने एक सिगरेट सुलगा ली, सामने से एक बुजुर्ग सज्जन आते दिखे, उन्हें देख कर लोग अदब से राह से हट जा रहे थे, जिससे युवक ने अनुमान लगाया वह संभवतः संस्थान में किसी प्रतिष्ठापूर्ण पद पर होंगे|
बुजुर्ग सज्जन जब करीब आ गए तो शालीनता वश युवक ने सिगरेट पीछे कर लिया| बुजुर्ग युवक के करीब आए और सहज मुस्कराहट से उन्होंने पूछा आप शायद यहाँ नए है? युवक ने शालीनता से जबाब दिया जी, पहली बार आया हूँ ! तो बुजुर्ग ने कहाँ हाँ ! तभी आपको नहीं पता, यहाँ धुम्रपान निषेध है और एक बार पुनः युवक पर सहज वात्सल्यपूर्ण मुस्कराहट डालकर आगे बढ़ गए |
युवक मुदित-चकित भाव से बुजुर्ग को देखता रहा, निषेध है बस बता कर बुजुर्ग आगे बढ़ गए, यह बता देना कितना सहज था, अबतक उसने यही देखा था कि मनाही के साथ-साथ मना करने वाला अपना रौब भी दिखाता था, कभी-कभी यह भी होता था कि मनाही करने वाला मोहलत भी देने लगता खैर, पहली बार है,पी लीजिये पर आइन्दा याद रखियेगा कि यहाँ मनाही है कुल मिला कर मनाही करने वाला उस मनाही के बहाने ख़ुद के होने की स्थापना करता था, जबकि यह बुजुर्ग जो है, बस वह बाता कर आगे बढ़ गए |
अगली सुबह युवक टहलने निकला तो उसके पाँव पुनः उसी तरफ बढ़ चले, टहलते-टहलते अनायास ही अवचेतन में ही पल रही आदत के वश उसने सिगरेट सुलगा ली और इसका ध्यान तब आया जब बुजुर्ग सामने ही दिख गए, युवक की दशा मानो काटो तो खून नहीं वाली थी, बुजुर्ग ने युवक को देखा, एक परिचित मुस्कराहट डाली और कहा आपको दुबारा देख कर अच्छा लगा, यहाँ धुम्रपान निषेध है और आगे बढ़ गए |
_______________
कश्यप किशोर मिश्र      

Wednesday, June 25, 2014

पालिटिक्स

हत्या बस हत्या होती है ।
हत्यारा सिर्फ और सिर्फ हत्यारा होता है ।
हथियार कुछ भी हो सकता है, धार्मिकता, नास्तिकता, शून्यवाद, अस्तित्ववाद, जनसेवा, क्रांति, मानवाधिकार, सेना, कुछ भी ।
यह तो हत्यारे पर है, वह हथियार क्या बनाता है, एक हत्यारा जिस नली से किसी मरणासन्न को जीवनदायिनी आक्सीजन दी जा रही है, उसका इस्तेमाल उस रोगी की हत्या में कर लेता है । वह नली हत्यारा नहीं होती ।
...तो हमें ये पैतरें पता है ।
हथियार को हत्यारा बताने के पीछे तुम्हारी मंशा क्या है, दोस्त ?
एक सवाल पूछे? 
"तुम्हारी पालिटिक्स क्या है, दोस्त?"
__________________
कश्यप किशोर मिश्र

Saturday, June 21, 2014

बच्चे का रोना

__________
...सारी नफरत निकल चुकी थी, हिंसा के विभत्स ताडंव से बस्ती सारी रात के दौरान कई बार गुजरी और हिंसक हमलावरों ने बर्बर होकर, चुन चुन कर एक एक आदमी का, जो भी मिले उनका कत्ल कर डाला ।

सुबह की उजास के साथ हमलावर अपने रक्तरंजित हथियार पोछते लौटनें लगे, कि तभी एक झोपड़ी से एक बच्चे के रोनें की आवाज आई, बच्चा जग कर दूध के लिए अपनीं माँ को ढ़ूढ़ रहा था, लौटते हुए हमलावरों के कदम रूक गए । वो पलट कर वापस देखनें लगे । झोपड़ी के दरवाजे से रोते हुए, दूध और अपनी माँ को तलाशता एक दो साल का बच्चा बाहर आया, हमलावरों के नेता और रोते बच्चे की निगाहें आपस में मिली । हमलावरों के नेता के पैर लरज गए ।

...इस बात को आज साठ बरस गुजर चुके हैं, अपनें उम्र के चौथेपन में चल रहे, हमलावरों के नेता के पैर अपनें नाती पोतों के रोनें की आवाज से लरज जातें है, वह धम्म से जमीन पर गिर पड़ता है ।
_____________
कश्यप किशोर मिश्र